कानपुर की मिट्टी आज भी अंग्रेजी हुकूमत की कहानी बयां करती है. यहां के वीआईपी रोड में मौजूद गोरा कब्रिस्तान ब्रिटिश शासन की याद दिलाता है. सबसे अजीब बात यह है कि उस दौर में अंग्रेजों के नवजात बच्चे यहां का मौसम नहीं झेल पाते थे. उनकी मौत हो जाती थी. गोरा कब्रिस्तान के मौजूद कब्रों में से 50 प्रतिशत से ज्यादा कब्रें नवजात बच्चों की हैं. जिनकी उम्र कुछ माह से लेकर 2-3 साल तक की बताई जाती है.
इस गोरा कब्रिस्तान में करीब एक हजार के करीब कब्रें हैं.गोरा कब्रिस्तान के केयरटेकर के.बी. शाही के ने बताया कि 1765 में अवध के नवाब के साथ अंग्रेजों का एक समझौता हुआ. इसके तहत कानपुर में छावनी बनाने की मंजूरी मिली. बताया जाता है कि 1765 के दशक में अंग्रेजी फौजों ने कानपुर में अपनी छावनी बनानी शुरू की थी.
इस दौरान कई लोगों की मौत भी हुई. जिन्हें दफानाने के लिए गंगा नदी के किनारे एक स्थान चिन्हित किया गया था. जिसको आज गोरा कब्रिस्तान कहते हैं.1920 में पुरातत्व विभाग ने किया संरक्षितकेयरटेकर शाही ने बताया कि यहां पर अंतिम कब्र तकरीबन 1899 के पास बनी थी. यहां मौजूद सभी कब्रें सेना के अफसर, डॉक्टर, उनके परिजनों की हैं. सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक बात यह है कि यहां मौजूद कब्रों में से 50 प्रतिशत से ज्यादा कब्रें नवजात बच्चों की हैं.
साल 1920 में यह कब्रिस्तान पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया था.सबसे पहली कब्र कर्नल जॉन स्टेन फोर्थ कीजानकर बताते है कि यहां पर सबसे पहली कब्र कर्नल जॉन स्टेन फोर्थ की थी. जिनको 1781 में दफनाया गया था. केयरटेकर शाही बताते हैं कि सिमिट्री में कई स्मारक ऐसे भी हैं, जिनके बारे में अभी तक जानकारी नहीं हो पाई है.
हो सकता है वह इससे भी पहले के हों. फिलहाल यहां बिग्रेडियर जनरल वाल्टर एलेक्स, कमांडर जनरल सर जान हाशफोर्ड नाइट की कब्र समेत तकरीबन 950 कब्रें मौजूद हैं.हर साल कब्र ढूंढने आते हैं कर्नल थामस के परिजनबताते हैं कि कनाडा के एक कर्नल जान थामस की मौत के बाद सन 1859 में उन्हें यहीं दफनाया गया था. लेकिन इसके साक्ष्य उपलब्ध नहीं है.
