मोती बाजरा (Pearl mille), बाजरा का सबसे व्यापक रूप से उगाया जाने वाला प्रकार है। यह प्रागैतिहासिक काल से अफ्रीका और भारतीय उपमहाद्वीप में उगाया जाता रहा है। फसल के लिए विविधता का केंद्र, पश्चिम अफ्रीका के सहेल क्षेत्र में है।उत्तर प्रदेश में क्षेत्रफल की दृष्टि से बाजरा का स्थान गेहूं धान और मक्का के बाद आता है कम वर्षा वाले स्थानों के लिए यह एक अच्छी फसल हैं। 40 से 50 सेमी० वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। बाजरा की खेती मुख्यतः आगरा, बरेली एवं कानपुर मण्डलों में होती है।
बाजरे की खेती (Millet farming):- बाजरे की राजस्थान में ऐसी खेती करके किसान बन सकते मालामालबाजरे की खेती (Millet farming):- बाजरे की राजस्थान में ऐसी खेती करके किसान बन सकते मालामालअच्छी उपज प्राप्त करने हेतु उन्नतिशील प्रजातियों का शुद्ध बीज ही बोना चाहिए। बुवाई के समय एवं क्षेत्र अनुकूलता के अनुसार प्रजाति का चयन करें बाजरा के लिए हल्की या दोमट बलुई मिट्टी उपयुक्त होती है।इस अनाज की खेती बहुत सी बातों में ज्वार की खेती से मिलती जुलती होती है।
यह खरीफ की फसल है और प्रायः ज्वार के कुछ पीछे वर्षा ऋतु में बोर्ड और उससे कुछ पहले अर्थात् जाड़े के आरंभ में काटी जाती हैं। इसके खेतों में खाद देने या सिंचाई करने की विशेष आवश्यकता नहीं होती। इसके लिये पहले तीन चार बार जमीन जोत दी जाती है और तब बीज बो दिए जाते हैं। एकाध बार निराई करना अवश्य आवश्यक होता है।इसके लिये किसी बहुत अच्छी जमीन की आवश्यकता नहीं होती और यह साधारण से साधारण जमीन में भी प्रायः अच्छी तरह होता है। यहाँ तक कि राजस्थान की बलुई भूमि में भी यह अधिकता से होता है।
गुजरात आदि देशों में तो अच्छी करारी रूई बोने से पहले जमीन तयार करने के लिये इसे बोते हैं। बाजरे के दानों का आटा पीसकर और उसकी रोटी बनाकर खाई जाती है। इसकी रोटी बहुत ही बलवर्धक और पुष्टिकारक मानी जाती है।कुछ लोग दानों को यों ही उबालकर और उसमें नमक मिर्च आदि डालकर खाते हैं। इस रूप में इसे ‘खिचड़ी’ कहते हैं। कहीं कहीं लोग इसे पशुओं के चारे के लिये ही बोते हैं। वैद्यक में यह वादि, गरम, रूखा, अग्निदीपक पित्त को कुपित करनेवाला, देर में पचनेवाला, कांतिजनक, बलवर्धक और स्त्रियों के काम को बढ़ानेवाला माना गया है। इस अनाज की खेती बहुत सी बातों में ज्वार की खेती से मिलती जुलती होती है।
यह खरीफ की फसल है और प्रायः ज्वार के कुछ पीछे वर्षा ऋतु में बोई और उससे कुछ पहले अर्थात् जाड़े के आरंभ में काटी जाती हैं। इसके खेतों में खाद देने या सिंचाई करने की विशेष आवश्यकता नहीं होती।बाजरे की खेती (millet farming) के लिए गर्मी का मौसम उपयुक्त होता है। कम बारिश वाले क्षेत्र में इसकी पैदावार अधिक होती है। बाजरे की खेती के लिए जलवायुबाजरे की खेती के लिए गर्मी का मौसम उपयुक्त होता है। कम बारिश वाले क्षेत्र में इसकी पैदावार अधिक होती है। अधिक बारिश वाले इलाकों में इसकी खेती से बचना चाहिए। जिन जगहों पर 40-60 सेंटीमीटर तक औसत बारिश होती हैं वहां इसकी अच्छी उपज होती है।
अगर बारिश निरन्तर होते रहती है तो सिंचाई की भी जरूरत नहीं पड़ती। तापमान 32 से 37 सेल्सियस इस खेती के लिए अच्छा होता है।बाजरे की खेती (millet farming) हमारे देश में सबसे अधिक राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होती है। इसके अलावा अन्य राज्यों जैसे- हरियाणा, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र में भी इसकी खेती खूब होती है।बाजरे की खेती के लिए मिट्टीबाजरे की खेती (Millet farming) लगभग हर तरह के मिट्टी में की जाती है, मगर बलुई दोमट मिट्टी सबसे ज़्यादा उपयुक्त होता है।
जलभराव वाले जमीन में इसकी खेती उपयुक्त नहीं होती है। पानी ज़्यादा दिनों तक भरे रहने से पौधों को रोग लग जाते हैं जिससे फसल बर्बाद हो जाते हैं। और पैदावार पर भी बुरा असर डालता है।बाजरे की खेती के लिए उन्नत किस्मेंअच्छी पैदावार के लिए जरूरी है की आप बाजरे की उन्नतशील किस्मों का ही चुनाव करें।
बाजरे की उन्नत किस्मों में आई. सी. एम. बी 155, डब्लू. सी. सी. 75, आई.सी. टी.बी. 8203 और राज- 171 प्रमुख हैं।
जबकि संकर प्रजातियों में पूसा-322, पूसा 23 और आई.सी एम एच 441, पायोनियर बाजरा बीज 86 एम 88 और 86 एम 84. बायर-9444 हाईब्रिड बाजरा शामिल हैं।
बाजरे की खेती (Millet farming):- बाजरे की राजस्थान में ऐसी खेती करके किसान बन सकते मालामालबाजरे की खेती (Millet farming):- बाजरे की राजस्थान में ऐसी खेती करके किसान बन सकते मालामालबाजरे की खेती के लिए खेत की तैयारीखरीफ का मौसम बाजरे की खेती (Millet farming) के लिए उपयुक्त होता है। इसके लिए गर्मी के दिनों में ही खेत की जुताई कर उसमें से खरपतवार हटा लें। पहली जुताई में ही 2-3 टन गोबर की खाद प्रतिहेक्टर की दर से मिट्टी में मिला लें।
बाजरे की अच्छी पैदावार के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाली हल से जुताई करें। इसके बाद दो तीन बार फिर से – जुताई करें। दो-तीन बार जुताई करने के बाद खेतों में बुआई करें। जिस जगह पर आप खेती करने जा रहे हैं। अगर उस जगह पर दीमक और लट का प्रभाव है तो 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फॉस्फोरस अंतिम जुताई से पहले डाल दें।बाजरे के बीजो का बीजोपचारबाजरे के बीज को बीज उपचार के बाद में डालने से अच्छी पैदावार के साथ ही रोग व विभिन्न कीटों से मुक्ति मिलती हैं। सहायक कृषि अधिकारी रमेश भारद्वाज ने बताया कि बाजरा का बीज उपचार करने के लिए 10 फीसदी नमक के घोल यानी 10 लीटर पानी में एक किलोग्राम नमक में बाजरे के बीज को थोड़ा-थोड़ा डालकर हाथ से हिलाएं।
बाजरे की खेती के लिए बीज की आवश्यकताबीज जिन क्षेत्रों में बारिश बहुत कम होती है, वहां मॉनसून शुरू होते ही बुआई कर देनी चाहिए। अगर आप उत्तर भारत में बाजरे की खेती (Millet farming) करना चाहते हैं तो वहां इस खेती के लिए जुलाई का पहला सप्ताह अच्छा होता है। जुलाई के अंत में बुआई करने से 40 से 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर फसल का नुक़सान होता है। बुआई में 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज का इस्तेमाल करें।
बाजरे के पौधे के बीच की दूरीबीजों को 40 से 50 सेंटीमीटर की दूरी पर बुआई करें। बीजों को एक कतार में बोएं। 10 से 15 दिन बाद अगर पौधे घने हो गए हैं तो छटाई कर दें। अगर बारिश का मौसम देर से आता है और अगर आप समय पर बुआई न कर पाए हैं तब ऐसी स्थिति में बुआई करने से बेहतर रोपाई करें। 1 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधा रोपाई के लिए लगभग 500 वर्गमीटर क्षेत्र में 2 से 3 किलोग्राम बीज उपयोग करते हुए जुलाई के पहले सप्ताह में नर्सरी तैयार कर लेनी चाहिए।अच्छी पैदावार के लिए फसलों की देखभाल करना भी बहुत आवश्यक है।
जिसके लिए 1 से 15 किलोग्राम यूरिया डालें, लगभग 2 से 3 सप्ताह बाद पौधों की रोपाई मुख्य खेत में करनी चाहिए। जब पौधों को क्यारियों से उखाड़ रहे हैं तो ध्यान रखें कि जड़ों को नुकसान ना पहुंचे। इसके अलावा नर्सरी में पर्याप्त नमी भी होना जरूरी है।बाजरा की खेती मे सिंचाईबाजरा की खेती (Millet farming) में अधिक सिंचाई की आवश्यकता नही होती है। बारिश नहीं होने पर 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई जरूर करें।
ध्यान रहे पौधों में जब फूल और जब दाना बन रहा हो तो खेत में नमी की मात्रा कम न हो। जलभराव की समस्या हो तो जल निकासी का समुचित प्रबंध कर दें।उर्वरकों प्रबन्धन उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण से प्राप्त संस्तुतियों के आधार पर करें मृदा परीक्षण की सुविधा उपलब्ध न हो तो संकुल प्रजातियों के लिए 60 किलोग्राम नत्रजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश तथा संकर प्रजातियों के लिए 80 किग्रा नत्रजन, 40 किग्रा फास्फोरस तथा 40 किग्रा. पोटाश प्रति है. प्रयोग करना चाहिए।
फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा बेसल ड्रेसिंग के रूप में बुवाई के समय तथा नत्रजन की आधी मात्रा टापड्रेसिंग के रूप में बुवाई के 20-25 दिन बाद खेत में पर्याप्त नमी होने पर प्रयोग करनी चाहिए। यदि पूर्व में बोयी गयी फसल में गोबर की खाद का प्रयोग न किया गया हो तो 5 टन गोबर की सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर देने से भूमि का स्वास्थ्य भी सही रहता है तथा उपज भी अधिक प्राप्त होती है। बीज को नत्रजन जैव उर्वरक एजोस्प्रीलिनम तथा स्फूर जैव उर्वरक फास्फेटिका द्वारा उपचारित कर बोने से भूमि के स्वास्थ्य में सुधार होता है तथा उपज भी अधिक मिलती है।
बाजरे की खेती में खरपतवार नियंत्रणबाजर की खेती में निराई-गुड़ाई का अधिक महत्व है। खरपतवारनाशी एट्राजीन (50 प्रतिशत डब्ल्यू, सी.) 0.75- 1.0 कि.ग्रा./हैक्टर या एलाक्लोर (50 ई.सी.) 1.5-2.0 लीटर / हैक्टर या एट्राजीन+पेन्डिमेथलीन 0.75-0.75 कि.ग्रा./ हैक्टर या एट्राजीन एलाक्लोर 0.75-0.75 कि.ग्रा./ हैक्टर घुलनशील चूर्ण का 600-800 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरन्त बाद अंकुरण के पूर्व प्रयोग करने से खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।
बाजरे की खेती में लगने वाले कीट व रोग और उनका प्रबंधन1.दीमकदीमक से बचने के लिए 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से क्लोरोपाइरीफॉस का पौधों की जड़ों में छिड़काव करें इसके अलावा हल्की वर्षा के समय मिट्टी में मिला कर बिखेर दें।2. तना मक्खी कीटयह मक्खियां पौधों को बढ़ने से रोकती है। जैसे ही पौधे बड़े होने लगते हैं उन्हें काट देती है। जिसके कारण पौधे सूख जाते हैं। इससे बचाव के लिए प्रति हेक्टेयर की दर से फॉरेट या 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मेलाथियान खेत में डालना चाहिए।
3. सफेद लटइस तरह के कीड़े पौधों की जड़ों को काटकर फसल को बर्बाद कर देते हैं। इससे बचाव के लिए फ्युराडॉन 3% या फोरेट 10 प्रतिशत की बुआई के समय मिट्टी में डालना चाहिए।रोग प्रबंधन1. मृदु रोमिलबाजरे के पौधों को कई तरह के रोग हो जाते हैंजैसे कि मृदु रोमिल आशिता इनसे बचाव के लिए हमेशा प्रमाणित बीजों का प्रयोग करें।बुआई से पहले रिडोमिल एम जेड 72 या थाईम से 3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीजोपचार करके बुआई करें।जो भी पौधा रोग ग्रस्त हो चुका है उसे जल्द से जल्द खेत से उखाड़ कर जला दें। फसल चक्र अपनाकर भी मृदु रोमन आशिता रोग से इस फसल को बचाया जा सकता है। और इस रोग को खत्म किया जा सकता है।
खड़ी फसल में 0.2 प्रतिशत की दर से डाईथेन जेड 78 या 0.35 प्रतिशत की दर से कॉपर oxychloride का पर्णिय छिड़काव करे। आवश्यकता पड़े तो 10 से 15 दिन बाद फिर से छिड़काव कर ले।2. अर्गटइस रोग से बचाव के लिए फसल की बुआई सही समय पर करें।प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें। जो पौधे खराब हो चुके हैं उनको हटा दें।इस बीमारी से बचाव के लिए बीजों को 10 प्रतिशत नमक के घोल में डालकर अलग कर देना चाहिए।
उसके बाद बीजों को धोकर साफ करें तथा सुखाकर बुवाई करें।बीजों को 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बाविस्टीन द्वारा उपचारित करके बोएं। खड़ी फसल में रोग की रोकथाम के लिए बाविस्टिन 0.1 प्रतिशत या जिराम 0.1 प्रतिशत का 2 से 3 बार छिड़काव करें।।
