लखनऊ। लोकसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक फ्रंट यानी PDA के जरिए चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में है। तमाम पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों को साथ जोड़कर पार्टी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को बैकफुट पर भेजने की कोशिश में है। अभी तक सपा MY (मुस्लिम + यादव) समीकरण को साधकर राजनीति करती रही है। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति को बदल दिया है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी ने सपा के मुस्लिम वोट बैंक पर एकाधिकार को खत्म करने की कोशिश शुरू कर दी है। मुस्लिम वोट बैंक पर नजर कांग्रेस की भी है। कांग्रेस ने यूपी में अपने चुनावी अभियान के तहत मुस्लिम वोटों को रिझाने की कोशिश तेज की है। इन सबके बीच भारतीय जनता पार्टी पसमांदा मुस्लिम समाज को जोड़ने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने लोकसभा चुनाव 2024 के लिए लक्ष्य मिशन 80 का रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने में मुस्लिम समाज का समर्थन जरूरी हो जाता है।
पसमांदा पॉलिटिक्स के जरिए भाजपा की कोशिश समाज के एक बड़े वर्ग पर अपनी पकड़ बनाने की है। पसमांदा समाज यानी मुसलमानों में पिछड़ा समाज अभी तक राजनीतिक तौर पर हाशिए पर रहा है। सरकारी योजनाओं से लेकर राजनीतिक तौर पर इस वर्ग को अधिक तबज्जो नहीं दी जाती रही है। मुस्लिम वर्ग में वोटों के ठेकेदारों के जरिए इस वर्ग को अपनी तरफ मोड़ने के लिए भावनाओं का सहारा लिया जाता रहा है। मंडल कमीशन आंदोलन के बाद देश में पिछड़े वर्ग के बीच राजनीतिक महत्वाकांक्षा का उभार तो हुआ, लेकिन मुस्लिम समाज का पिछड़ा वर्ग हमेशा अगड़ों के पीछे चलने वाला समूह ही बना रहा है। ऐसे में भाजपा ने इस वर्ग की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को जगाने की कोशिश शुरू कर दी है। मुसलमानों के पिछड़े वर्ग के बीच सरकारी योजनाओं के लाभ और अन्य लाभकारी योजनाओं से इसे जोड़कर पसमांदा समाज को कागजों की जगह जमीन पर काम होता दिखाने की कोशिश लगातार जारी है। पार्टी को उम्मीद है कि इस प्रकार के प्रयासों का असर दिखेगा।
