नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि और शीर्ष अदालत और हाई कोर्टों में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम की तरफ से अनुशंसित नामों में से ‘पिक एंड चूज’ की प्रथा स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि इससे परेशानी होती है। जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि सरकार को भेद नहीं करना चाहिए क्योंकि नामों की सिफारिश कॉलेजियम की तरफ से जजों की वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए की जाती है और नामों में छंटनी वरिष्ठता की प्रणाली बिगाड़ देती है। यह तीन सदस्यी बेंच सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की तरफ से अनुशंसित नामों को मंजूरी देने में केंद्र की ओर से देरी पर एक याचिका की सुनवाई कर रही थी।
10 जजों की नियुक्ति, 11 के ट्रांसफर पर फैसला अटका
सुनवाई की शुरुआत में केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बलबीर सिंह ने सरकार के विचाराधीन सभी लंबित नामों पर फैसला करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। ऐसे 21 नाम हैं जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए सरकार के विचाराधीन हैं। उच्च न्यायालय के लिए नियुक्ति के लिए दस नाम हैं- पांच नाम जिन्हें कॉलेजियम ने दोबारा केंद्र के पास भेजा था और पांच को पहली बार भेजा गया था। इनके अलावा 11 जजों का ट्रांसफर किया जाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर को दी थी चेतावनी
पीठ ने इस बात पर भी असंतोष व्यक्त किया कि पिछले कुछ हफ्ते पहले दी गई चेतावनी के बावजूद केंद्र सरकार ने फैसला लेने में फुर्ती नहीं दिखाई। सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा कि सरकार को और ज्यादा धक्का देने की जरूरत है। उसने सुनवाई को 7 नवंबर के लिए स्थगित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बीते 26 सितंबर को केंद्र को कहा था कि उसके पास कॉलेजियम की तरफ से जिन 86 जजों के नाम भेजे गए हैं, उन पर कोई फैसला लेकर आए वरना समस्या का सामना करने को तैयार रहे।
86 में 65 नामों को केंद्र ने किया क्लियर
ध्यान रहे कि जिन 86 नामों के अलावा 26 हाई कोर्टों के जजों के ट्रांसफर और एक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की नियुक्ति की भी सिफारिश की थी।
इसके बाद, सरकार ने अपने फैसलों में तेजी लाई, फिर भी उसके पास 86 में से 21 नामों पर फैसला नहीं हो सका है।
