नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट भारत की जनता का न्यायालय है। इसका मकसद लोगों की शिकायतों को समझना है। इसलिए कोई भी विधिमंडल यह नहीं कह सकता कि हमें यह निर्णय गलत लगता है और इसलिए हम इसे अस्वीकार करते हैं। विधिमंडल को सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सीधे रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है, ऐसा प्रखर मत मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड़ ने आज व्यक्त किया। वह एक मीडिया हाउस के कार्यक्रम में बोल रहे थे।
शनिवार को आयोजित एक मीडिया हाउस के कार्यक्रम में मुख्य न्यायाधीश ने न्यायपालिका और कानून से जुड़े मुद्दों पर अपने प्रखर मत व्यक्त किए। किसी भी मामले का फैसला करते समय न्यायाधीशों को सार्वजनिक नैतिकता के बजाय संविधान की नैतिकता द्वारा निर्देशित किया जाता है, जब कोई जज किसी मामले में फैसला देता है तो वह समाज और लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में नहीं सोचता। जनता द्वारा निर्वाचित सरकार और न्यायपालिका के बीच यह बड़ा अंतर है। उन्होंने कहा कि विधायिका न्यायालय द्वारा दिए गए किसी भी फैसले की कमियों को दूर करने के लिए नए नियम बना सकती है, लेकिन फैसले को पलट नहीं सकती। गुणवत्ता को पुन: परिभाषित करने की आवश्यकता है।
यदि सभी को समान अवसर मिले तो अधिक महिलाएं न्यायपालिका में प्रवेश करेंगी। भारतीय सुप्रीम कोर्ट जो करता है, वह अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से बहुत अलग है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट प्रति वर्ष लगभग ८० मामलों का फैसला करता है। इस साल हमने अब तक ७२ हजार मामले निपटाए हैं। अभी दो महीने बाकी हैं। सच तो यह है कि न्यायाधीश चुने नहीं जाते। यही हमारी ताकत होने की राय चंद्रचूड़ ने व्यक्त की।
