मध्यप्रदेश: पश्चिम मध्यप्रदेश में एक इलाका ऐसा है जहां उम्मीदवारों को मतदाताओं को उनके गांव में जाकर समझाने के लिए खाटला चौपालें लगानी पड़ती हैं और इन चौपालों के तत्काल बाद सेव-परमल का नाश्ता करवाना अनिवार्य होता है. इन खाटला बैठकों को स्थानीय आदिवासी भाषा में मीटिंग भी कहां जाता है.
स्थानीय राजनीति के जानकार कहते हैं कि बिना सेव परमल के आपकी मीटिंग यानी खाटला बैठकें फैल हो सकती हैं. ग्रामीण नाराज हो सकते हैं, इसलिए उम्मीदवारों की मजबूरी है कि उन्हें अपने काफिले में एक वाहन सेव परमल से भरा हुआ शामिल करना पड़ता है. उस वाहन को देखकर ही बैठकों में संख्या बढ़ती है. यह सेव परमल खिलाने की परंपरा बीते कुछ दशक पहले शुरू हुई और अब यह परंपरा अनिवार्यता बन गई है. राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को यह सबसे बड़ा खर्च है. लेकिन इसे छिपाकर करने की भी मजबूरी है, क्योंकि भारत निर्वाचन आयोग ने खर्च की सीमा तय कर रखी है.
क्या बिना सेव परमल खिलाए खाटला बैठकें यानी मीटिंग सफल हो सकती हैं? यह सवाल जब हमने बीते चार विधानसभा चुनाव कवर कर चुके वरिष्ठ पत्रकार दिनेश वर्मा से किया तो उनका कहना था कि सेव-परमल उम्मीदवारों की ग्रामीण इलाकों में बैठकों की सफलता की गारंटी है. क्योंकि बिना भीड़ के आप बैठकें किसके साथ करेंगे? भीड़ आपकी बात सुनने तभी एक जाजम पर बैठेगी. वरना उदासीनता साफ देखी जाती है. इतना ही नहीं, अगर बैठक हो जाए और अगर सेव परमल ना बंटे तो नाराजगी उम्मीदवार के खिलाफ वोट में बदल सकती है. यह खर्चा राजनीतिक दलों के साथ साथ निर्दलीय उम्मीदवारों को भी उठाना मजबूरी है.
