नई दिल्ली:- छत्तीसगढ़ में घने जंगलों से आच्छादित जशपुर इलाका दुर्गम तो है ही, साथ ही यहां के जंगलों में ऐसी Tribal Communities बसती हैं जो 21वीं सदी तक आदिमानव जैसा जीवन जीने की अभ्यस्थ थीं. शरीर को कपड़ों से ढंकना तो दूर, आखेट करके जंगली जानवरों का मार कर खाना ही उनकी जीवनशैली थी. नतीजतन, बिरहोर और पहाड़ी कोरवा जैसी जनजातियां समय के साथ कदमताल करने में नाकाम रहने के कारण विलुप्त होने की कगार पर आ गई. जशपुर के शिवरीनारायण वन क्षेत्र में रहने वाली बिरहोर जनजाति की आबादी महज 3 हजार तक रह गई थी. तभी पड़ोसी गांव अंबा टोली के जागेश्वर यादव ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक इस जनजाति का संरक्षण करने की गुहार लगाई. सरकार की तरफ से जब कोई ठोस उपाय नहीं हुए तो जागेश्वर ने खुद इस समुदाय के Social Upliftment काे ही अपने जीवन का मकसद बना लिया. उनके भगीरथ प्रयास को अब पद्मश्री से नवाजा जाएगा.
नंगे पैर सेवा करते रहे ‘बिहोर के भाई‘
जशपुर इलाके में बिरहोर और पहाड़ी कोरवा जनजाति के लोग 1990 के दशक तक सामाजिक जीवन से पूरी तरह अनभिज्ञ थे. जंगल से बाहर की दुनिया से घुलना मिलना उनके उन्हें गवारा नहीं था. एक समय ऐसा भी आया जब वनवासी जीवन में हालात इतने विपरीत हो गए कि इन लोगों को मरे हुए पशुओं का मांस तक खाने की नौबत आ गई. इससे इनकी death rate बढ़ गई.
इस समुदाय के वजूद पर गहराते संकट को भांप कर जागेश्वर ने इन समुदायों के साथ मेलजोल बढ़ाने का जोखिम उठाया. इसके लिए वह बेहद कम कपड़ों में नंगे पैर रह कर इनके करीब पहुंचे. जनजाति के लोगों को जंगल के बाहर की दुनिया का दीदार कराया. लगभग दो दशक की निरंतर कोशिश के बाद उन्हें कपड़े पहनने से लेकर आम इंसानों की तरह भोजन करने के अलावा खेती करना भी सिखा दिया.
इस काम में जागेश्वर इतने तल्लीन हो गए कि खुद अपना घर बसाने की भी उन्हें सुध नहीं रहीं. आज भी नंगे पैर रह कर जागेश्वर इन्ही जनजातियों के उत्थान में लगे हैं. अब वह इलाके में ‘बिहोर के भाई’ कहलाने लगे हैं. उन्होंने जशपुर में आश्रम की स्थापना करके अब वह निरक्षरता उन्मूलन और स्वास्थ्य सेवा के मानकों को बेहतर बनाने के मिशन में लगे हैं. इन जनजातियों के लोग उन्हें अपना देवता मानते हैं. समाज के प्रति उनके इस सेवा भाव को सम्मानित करने के लिए उन्हें शीर्ष नागरिक सम्मान पद्मश्री दिया जाएगा.
वैद्यराज मांझी और कथक नर्तक को भी पद्मश्री
भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश की 110 विभूतियों को पद्मश्री सम्मान के लिए चयनित करने की घोषणा की. छत्तीसगढ़ से जागेश्वर यादव के अलावा दो अन्य गुमनाम हीरो के तौर पर रायगढ़ के कथक नर्तक पंडित राम लाल बरेठ और नारायणपुर के वैद्यराज हेमचंद मांझी भी शामिल हैं. पं. बरेठ को कला क्षेत्र में, वैद्यराज हेमचंद मांझी को चिकित्सा क्षेत्र में तथा जागेश्वर यादव को समाज सेवा के क्षेत्र में उनकी उल्लेखनीय सेवाओं के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया जाएगा.
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इन्हें Social Hero करार देते हुए कहा कि यह उपलब्धि पूरे राज्य के लिए गौरव की बात है. साय ने बिरहोर एवं पहाड़ी कोरवा समाज को विशेष पिछड़ी जनजाति का दर्जा दिलाने और इन्हें समाज की मुख्य धारा में शामिल करने के लिए जागेश्वर यादव के प्रयासाें काे अनुकरणीय बताया. उन्होंने यादव से फोन पर करके उन्हें बधाई भी दी.
इसी प्रकार वैद्यराज हेमचंद मांझी ने नारायणपुर के अबूझमाड़ इलाके में पारंपरिक औषधियों एवं जड़ी-बूटियों का सटीक प्रयोग करके बीते पांच दशकों से जरूरतमंद लोगों काे Medical Services दी हैं. जिन दुर्गम इलाकों में सरकारें सामान्य Health Facilities नहीं पहुंचा पाई, उनमें मांझी ने traditional medicine पद्धति से लोगों के दर्द को दूर किया. मांझी 15 साल की उम्र से ही अपने पारंपरिक औषधि ज्ञान से जरूरतमंद लोगों का इलाज कर रहे है. अबूझमाड़ के जंगलों में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियों का उन्हें विशेष ज्ञान है.
वहीं, मूर्धन्य नर्तक पंडित राम लाल बरेठ ने कला के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. रायगढ़ के रहने वाले पंडित राम लाल बरेठ के पिता कार्तिक राम बरेठ भी कथक डांसर थे. पंडित राम लाल बरेठ को संगीत नाटक अकादमी सम्मान से भी पुरस्कृत किया जा चुका है.
छत्तीसगढ़ के 29 लोगों को पद्मश्री सम्मान
वर्ष 1976 से लेकर 2023 तक छत्तीसगढ़ की 26 विभूतियों को पद्मश्री सम्मान मिल चुका है. पंडित राम लाल बरेठ, जागेश्वर यादव एवं वैद्यराज हेमचंद मांझी काे मिलाकर यह संख्या 29 हो जाएगी. इनमें पंडवानी गायिका तीजन बाई छत्तीसगढ़ की एक मात्र हस्ती है, जिन्हें तीनों पद्म सम्मान मिले हैं. उन्हें वर्ष 1988 में पद्मश्री, वर्ष 2003 में पद्म भूषण तथा वर्ष 2019 में पद्म विभूषण से नवाजा गया.
