नई दिल्ली:- 2024 में देशभर के कुल युवाओं में से 40 फीसदी से कम ने मतदान के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है। भारत में सबसे कम उम्र के मतदाता, जिनकी उम्र 18 या 19 साल है, वो आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर खास दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। इसमें बिहार, दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में रजिस्ट्रेशन की दर और भी कम है। चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि इस आयु वर्ग में अनुमानित 4.9 करोड़ नए वोटर्स हैं, इनमें से केवल 38 फीसदी ही रजिस्टर्ड हैं।
लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के करीब एक पखवाड़े बाद इलेक्शन कमिशन ने आंकड़े जारी किए हैं। इनमें 18 और 19 वर्ष के लगभग 1.8 करोड़ से कुछ ज्यादा ही नए मतदाता वोटिंग लिस्ट से जुड़े हैं। इस आयु वर्ग की अनुमानित जनसंख्या 4.9 करोड़ से कम है। इसका अर्थ है कि पहली बार मतदान करने वाले वोटरों में से करीब 38 फीसदी ही मतदाता सूची में रजिस्टर्ड हैं। तेलंगाना इस लिस्ट में टॉप पर है। राज्य में 18-19 आयु वर्ग में 8 लाख से अधिक वोटर्स रजिस्टर्ड हैं। इस सूची में बिहार सबसे नीचे है, जहां संभावित 54 लाख में से केवल 9.3 लाख वोटर्स ही रजिस्टर्ड हैं।
सबसे कम उम्र के आयु वर्ग को शामिल करने में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला राज्य तेलंगाना है, जो भारत का सबसे नया राज्य है। इस राज्य में 8 लाख से अधिक 18 और 19 वर्ष के मतदाता मतदाता सूची में हैं, जो इस आयु वर्ग के लिए अनुमानित 12 लाख की जनसंख्या का लगभग दो-तिहाई या 66.7 फीसदी है। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल दो अन्य राज्य हैं जो 60 फीसदी या उससे अधिक युवा वोटर्स के रजिस्ट्रेशन में सफल रहे हैं।
दूसरी ओर, देश की सबसे कम उम्र की आबादी के रजिस्ट्रेशन वाला राज्य बिहार है, जहां संभावित 54 लाख में से केवल 9.3 लाख युवा मतदाता हैं। दिल्ली की बात करें तो यहां 7.2 लाख युवाओं में से केवल 1.5 लाख मतदाता रजिस्टर्ड हैं, जो हर पांच में से एक यानी 21 फीसदी से थोड़ा अधिक है। यूपी में 23 फीसदी और महाराष्ट्र में 27 फीसदी युवाओं ने रजिस्ट्रेशन के साथ खास बेहतर प्रदर्शन नहीं किया है। विडंबना यह है कि राजनीतिक दलों की ओर से युवाओं को भारत के भविष्य और चुनावी नतीजों के लिए महत्वपूर्ण बताने के बाद भी यह संख्या इतनी कम है।
महाराष्ट्र के स्कूलों और कॉलेजों में नागरिक अधिकारों और शासन के मुद्दों पर कार्यशाला आयोजित करने वाले मार्क माई प्रेजेंस के चैतन्य प्रभु युवाओं की इस उदासीनता से असहमत हैं। उनका कहना है कि राजनीतिक प्रक्रिया और शासन के मुद्दों की जानकारी की कमी चुनौतियां पैदा करती है। उन्होंने कहा कि पूरे स्कूल और कॉलेज में, छात्र इस धारणा के साथ रहते हैं कि राजनीति एक बुरा शब्द है। आप अचानक उनसे 18 साल की उम्र में बदलने और चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने की उम्मीद नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि सीबीएसई को छोड़कर, चुनाव और राजनीति की मूल बातें स्कूलों में पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में भी नहीं पढ़ाई जाती हैं।
