नई दिल्ली:- शिव से जी ब्रह्मा, विष्णु और समस्त सृष्टि का उद्भव हुआ है. भगवान शिव के बारे में कहा जाता है कि शिव साकार भी हैं और निराकार भी, शिव आदि भी हैं और अनंत भी. संसार में सभी रूपों में शिव विद्यमान हैं. इसलिए शिव को किसी एक रूप में बांध देना उन्हें सीमित कर देने जैसा होगा. लेकिन हमने चित्रों और मूर्ति में जिस रूप में शिव को देखा है और जिस रूप में उनकी पूजा होती है वह निराधार नहीं हैं. पौराणिक व धार्मिक कथाओं में शिव के स्वरूप का चित्रण कुछ इसी प्रकार से है.
शिव का जो स्वरूप है वह अन्य देवी-देवताओं से बहुत अलग है. शिव फूल मालाओं और आभूषणों से श्रृंगार करने के बजाय भस्म का श्रृंगार करते हैं. गले में सर्पों की माला पहनते हैं, वस्त्र के रूप में बाघंबर छाल पहनते हैं. उन्होंने अपने मस्तक पर चंद्रमा को सुशोभित किया है और जटा में गंगा विराजित हैं. केवल स्वरूप ही नहीं बल्कि भगवान शिव के द्वारा धारण किए गए अस्त्र, शस्त्र और वस्त्र सभी विचित्र होने के साथ ही अद्भुत है, जिससे विशेष अर्थ जुड़ा है. भगवान शिव द्वारा धारण की गई प्रत्येक वस्तु का विशेष महत्व और अर्थ है. आइये जानते हैं इसके बारे में-
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शिव के 10 प्रतीक (Lord Shiva 10 Symbols Significance and Meaning)
चंद्रमा: ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह कहा गया है. भगवान शिव के शीश पर अर्धचंद्रमा सुशोभित है. शिवजी ने अर्धचंद्र को आभूषण की तरह अपनी जटा में धारण किया है. इसलिए शिवजी को सोम और चंद्रशेखर भी कहा जाता है. चंद्रमा आभा, प्रज्वल, धवल स्थितियों को प्रकाशित करता है, जिससे मन में अच्छे विचार उत्पन्न होते हैं. भगवान शिव के सिर पर विराजमान अर्धचंद्रमा को मन की स्थिरता और आदि से अनंत का प्रतीक माना जाता है.
सर्प माला: भगवान शिव फूल, रत्न या किसी धातु की माला नहीं बल्कि सर्प की माला पहनते हैं. भगवान शिव के गले में वासुकी नाग है. शिव के गले में नाग तीन बार लिपटा हुआ है जोकि भूत, वर्तमान और भविष्य का सूचक माना जाता है. सांप तमोगुणी प्रवृतियों का प्रतीक है और शिव के गले में होने के कारण यह संदेश मिलता है कि तमोगुणी प्रवृतियां शिव के अधीन या वश में हैं.
तीसरी आंख: शिवजी के तीन नेत्र हैं. तीसरी आंख शिव के क्रोध के समय खुलती है और तीसरी आंख खुलते ही प्रलय आ जाता है. वहीं सामान्य परिस्थितियों में भी शिवजी का तीसरा आंख विवेक के रूप में जागृत रहता है. इसलिए शिवजी की तीसरी आंख को ज्ञान और सर्व-भूत का प्रतीक माना गया है. शिवजी जी की तीसरी आंख ऐसी दृष्टि का बोध कराती है, जोकि 5 इंद्रियों से परे है. इसलिए शिव को त्र्यम्बक कहा जाता है.
त्रिशूल: अस्त्र के रूप में शिव के हाथ में हमेशा त्रिशूल रहता है. माना जाता है कि त्रिशूल दैविक, दैहिक और भोतिक तापों का नाश करने का मारक शस्त्र है. भगवान शिव के त्रिशूल में राजसी, सात्विक और तामसी तीनों गुण समाहित हैं. इसके साथ ही त्रिशूल ज्ञान, इच्छा और पूर्णता का प्रतीक है.
डमरू: डमरू के बजते ही शिव का तांडव शुरू हो जाता है और शिव के तांडव से विध्वंस होने लगाता है. शिवजी के डमरू का रहस्य यह है कि इसके ब्रह्मांडीय ध्वनि से ‘नाद’ उत्पन्न होती है, जिसे ब्रह्मा का रूप माना जाता है. क्योंकि जब विध्वंस होता है तब ब्रह्मा निर्माण करते हैं. डमरू को संसार का पहला वाद्य यंत्र माना जाता है. शिव के हाथों में डमरू सृष्टि के आरंभ और ब्रह्म नाद का सूचक है.
रुद्राक्ष: रुद्राक्ष को लेकर ऐसी मान्यता है कि इसकी उत्पत्ति शिव के आंसुओं से हुई है. पौराणिक कथा के अनुसार, जब शिवजी ने गहरे ध्यान के बाद अपनी आंखें खोली तो उनकी आंखों से आंसू की बूंद पृथ्वी पर गिरी, जिससे रुद्राक्ष वृक्ष की उत्पत्ति हुई. शिवजी अपने गले और हाथों में रुद्राक्ष पहनते हैं जो शुद्धता और सात्विकता का प्रतीक है.
गंगा: शिवजी की जटा में गंगा है. पौराणिक कथा के अनुसार गंगा का स्त्रोत शिव है और शिवजी की जटाओं के माध्यम से ही मां गंगा का आगमन स्वर्ग से धरती पर हुआ. शिव द्वारा जटा में गंगा को धारण करना आध्यात्म और पवित्रता को दर्शाता है.
बाघंबर वस्त्र: बाघ को शक्ति, ऊर्जा और सत्ता का प्रतीक माना जाता है. शिवजी वस्त्र के रूप में बाघ की खाल धारण करते हैं, जोकि यह दर्शाता है कि वे सभी शक्तियों से ऊपर हैं. साथ ही इसे निडरता और दृढ़ता का भी प्रतीक माना जाता है.
नंदी: शिवजी के वाहन नंदी वृषभ यानी बैल हैं. इसलिए सभी शिव मंदिर के बाहर नंदी जरूर होते हैं. धर्म रूपी नंदी के चारों पैर चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को इंगित करते हैं.
भस्म: भगवान शिव अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं, जो इस बात का संदेश है कि संसार नश्वर है और हर वस्तु को एक दिन खाक में मिल जाना है. लेकिन जब मिटेगा तब सृजन भी जरूर होगा. भस्म शिव के विध्वंस का प्रतीक है, जिसके बाद ब्रह्मा जी पुनर्निमाण करते हैं.
