नई दिल्ली:- सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसले में 6-1 के बहुमत से माना है कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) का उप-वर्गीकरण एससी/एसटी श्रेणियों के भीतर अधिक पिछड़े लोगों के लिए अलग से कोटा देने के लिए स्वीकार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह उप-वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता है।
फैसले का विवरण
सर्वोच्च न्यायालय ने 2004 के ईवी चिन्नैया फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण स्वीकार्य नहीं है। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जातियां एक समरूप वर्ग नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उप-वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता है और अनुच्छेद 15 और 16 राज्य को किसी जाति को उप-वर्गीकृत करने से नहीं रोकते हैं।
सामाजिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
इस फैसले को सामाजिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। इसके तहत अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण की अनुमति दी गई है, जिससे अनुसूचित जातियों की श्रेणियों में पिछड़े लोगों के लिए अलग से कोटा दिया जा सकेगा।
अधिवक्ता पी वेंकटेशन की प्रतिक्रिया
फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अधिवक्ता पी वेंकटेशन ने कहा, आज, 7 न्यायाधीशों की पीठ ने उप-वर्गीकरण पर फैसला सुनाया और ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के मामले में 2004 के फैसले को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय कानून में गलत था और इसकी अनुमति नहीं है। एससी/एसटी के बीच उप-वर्गीकरण की अनुमति है क्योंकि वे संवैधानिक रूप से पिछड़े वर्ग हैं और उनके बीच वंचित समूह भी हैं। संबंधित राज्य सरकारों से डेटा लेकर इस पर विचार किया जाना चाहिए, और क्रीम लेयर पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।”
