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    क्या भगत सिंह की फांसी रुकवा सकते थे महात्मा गांधी, इस बात में थी कितनी सच्चाई जानें……

    By Tv 36 HindustanAugust 12, 2024No Comments10 Mins Read
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    : क्रांतिकारियों को अहिंसक रास्ते से आजादी हासिल होने की उम्मीद नहीं थी. सरदार भगत सिंह, सुखदेव ,राजगुरु खुशी-खुशी फांसी पर चढ़ने को तैयार थे. दूसरी ओर समूचे देश की जनभावनाएं इन वीर नौजवानों के साथ थीं और जनता चाहती थी कि हर हाल में उनकी फांसी रुके. इस फांसी को कौन रुकवा सकता था? जनता के पास एक ही जवाब था गांधी सिर्फ गांधी. फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ.क्या वाकई में भगत सिंह की फांसी रुकवा सकते थे महात्मा गांधी? इरविन के सामने यह रखी थी मांग23 मार्च को देश के वीर सपूतों सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई.फॉलो करें:

    बेशक मंजिल एक थी लेकिन उनके रास्ते अलग थे. गांधी को किसी भी दशा में हिंसा का रास्ता स्वीकार नहीं था. उधर क्रांतिकारियों को अहिंसक रास्ते से आजादी हासिल होने की उम्मीद नहीं थी. सरदार भगत सिंह, सुखदेव ,राजगुरु खुशी-खुशी फांसी पर चढ़ने को तैयार थे. दूसरी ओर समूचे देश की जनभावनाएं इन वीर नौजवानों के साथ थीं और जनता चाहती थी कि हर हाल में उनकी फांसी रुके. इस फांसी को कौन रुकवा सकता था? जनता की राय में गांधी सिर्फ गांधी.क्रांतिकारी नौजवानों की कार्रवाई को दो टूक गलत ठहराने वाले गांधी आगे भी आए. फांसी को टलवाने की उन्होंने कोशिशें भी कीं लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

    क्या गांधी की कोशिशें आधी-अधूरी थीं ? अपने जीवनकाल में गांधी को इस सवाल का कई मौकों पर सामना करना पड़ा. आजादी की लड़ाई के पन्ने पलटते लोग आज भी इस सवाल के जवाब की तलाश में रहते हैं. पढ़िए इसकी अंतर्कथा,हिंसक रास्ते का गांधी ने हमेशा किया विरोधक्रांतिकारियों द्वारा वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की ट्रेन की बोगी को 23 दिसंबर 1929 को उड़ाने की असफल कोशिश के बाद गांधी और क्रांतिकारी एक बार फिर आमने -सामने थे. इस कार्रवाई से क्षुब्ध गांधी ने नौजवानों की कारवाई को गलत ठहराते हुए एक तीखा लेख बम की उपासना लिखा.

    यंग इंडिया (अंग्रेजी) के 2 जनवरी 1930 के अंक में यह छपा. क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा ने बम का दर्शन लेख के जरिए इसका जवाब दिया. माना जाता है कि सरदार भगत सिंह ने जेल में इसे अन्तिम रूप दिया. 26 जनवरी, 1930 को इसे देश भर में वितरित किया गया.

    बम की उपासनागांधी ने लिखा था कि हम लोगों के चारों और इतनी ज्यादा हिंसा व्याप्त है कि कभी इधर-उधर बमों के फेंके जाने से किसी को कोई परेशानी महसूस नहीं होती. यदि मैं यह न जानता होता कि यह हिंसा किसी हिलाए गए तरल पदार्थ में ऊपर के तल पर उठकर आया हुआ झाग मात्र है, तो शायद मैं निकट भविष्य में अहिंसा से स्वतंत्रता दिला सकने में सफल होने के बारे में निराश हो जाता. हिंसा या अहिंसा का सिद्धांत मानने वाले हम सब लोग ही स्वतंत्रता के लिए प्रयत्ननशील हैं. खुशकिस्मती से पिछले लगभग 12 महीनों में भारत के अपने दौरे के अनुभवों के आधार पर मुझे भरोसा हो गया है कि देश की स्वतंत्रता प्रेमी जनता हिंसा की भावना से अछूती है.

    इसलिए वायसराय की रेलगाड़ी नीचे हुए बम विस्फोट की तरह होने वाले इक्के-दुक्के हिंसापूर्ण विस्फोटों के बावजूद मैं यह मानता हूं कि हमारे राजनीतिक संघर्ष में अहिंसा की जड़ें जम गई हैं. हम एक क्षण यह सोचें कि अगर वायसराय गम्भीर रूप से घायल हो जाते या मारे जाते तो क्या होता?तब यह तो निश्चित ही है कि पिछले महीने की 23 तारीख को कोई सभा नहीं हो पाती और इसलिए यह निश्चित न हो पाता कि कांग्रेस को क्या तरीका अपनाना है? हम लोगों के सौभाग्य से वायसराय और उनके दल में कोई जख्मी नहीं हुआ और उन्होंने बड़े सहज भाव से दिनभर का अपना कार्यक्रम इस तरह निभाया, मानो कुछ हुआ ही न हो. मैं जानता हूं कि जिन लोगों को कांग्रेस का भी कोई खयाल नहीं है, जो उससे कुछ आशा नहीं रखते और जिन्हें सिर्फ हिंसा के साधन का ही भरोसा है, उन पर इस परिकल्पी तर्क का कुछ असर नहीं पड़ेगा. लेकिन मैं आशा करता हूं कि अन्य लोग इस दलील के सार को समझ सकेंगे कि जब-जब हिंसा हुई है, हर बार हमें गहरा नुकसान पहुंचा है.

    बम का दर्शनक्रांतिकारियों ने “बम का दर्शन” लेख के जरिए पलटवार किया. उन्होंने लिखा, “हाल की घटनाएं! विशेष रूप से 23 दिसम्बर, 1929 को वायसराय की स्पेशल ट्रेन उड़ाने का जो प्रयत्न किया गया, उसकी निन्दा करते हुए कांग्रेस द्वारा पारित किया गया प्रस्ताव तथा यंग इंडिया में महात्मा गांधी द्वारा लिखे गए लेखों से साफ हो जाता है कि कांग्रेस ने महात्मा गांधी से साठ-गांठ कर भारतीय क्रांतिकारियों के विरुद्ध आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया है. जनता के बीच भाषणों तथा पत्रों के माध्यम से क्रांतिकारियों के विरुद्ध बराबर प्रचार किया जाता रहा है. परन्तु क्रांतिकारी अपने सिद्धान्तों तथा कार्यों की ऐसी आलोचना से नहीं घबराते हैं.पहले हम हिंसा और अहिंसा के प्रश्न पर ही विचार करें. हिंसा का अर्थ है अन्याय के लिए किया गया बल प्रयोग. परन्तु क्रांतिकारियों का तो यह उद्देश्य नहीं है.

    दूसरी ओर अहिंसा का जो आम अर्थ समझा जाता है वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धान्त. उसका उपयोग व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है. अपने-आपको कष्ट देकर आशा की जाती है कि इस प्रकार अन्त में अपने विरोधी का ह्रदय परिवर्तन संभव हो सकेगा.एक क्रांतिकारी जब कुछ बातों को अपना अधिकार मान लेता है तो वह उनकी मांग करता है, अपनी उस मांग के पक्ष में दलीलें देता है. समस्त आत्मिक शक्ति के द्वारा उन्हें प्राप्त करने की इच्छा करता है. उसकी प्राप्ति के लिए अत्यधिक कष्ट सहन करता है. इसके लिए वह बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए प्रस्तुत रहता है और उसके समर्थन में वह अपना समस्त शारीरिक बल प्रयोग भी करता है.

    इसके इन प्रयत्नों को आप चाहे जिस नाम से पुकारें, परन्तु आप इसे हिंसा के नाम से सम्बोधित नहीं कर सकते. सत्याग्रह का अर्थ है सत्य के लिए आग्रह. उसकी स्वीकृति के लिए केवल आत्मिक शक्ति के प्रयोग का ही आग्रह क्यों? इसके साथ-साथ शारीरिक बल-प्रयोग भी क्यों न किया जाए?फांसी रुकवाने के लिए उठती आवाजें और गांधी से सवालविशेष ट्रिब्यूनल 7 अक्तूबर 1930 को सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुना चुका था. प्रिवी काउंसिल से भी उनकी अपील खारिज हो गई. जेल पर हमला कर उन्हें छुड़ाने की साथियों की कोशिश भी नाकाम रहीं. जनता के बीच से फांसी रुकवाने के लिए आवाजें उठ रही थीं. इन्हीं दिनों गांधी और वायसराय इरविन के बीच 17 फरवरी 1931 से 5 मार्च के बीच समझौता वार्ता चली.सभी को पता था कि गांधी क्रांतिकारियों के हिंसा के रास्ते के खिलाफ हैं. फिर भी हालात जिस मुकाम पर थे, वहां लोगों की चाहत थी कि इरविन से समझौते की शर्त में भगत सिंह और साथियों की फांसी रोकना गांधी शामिल करें. लेकिन समझौते के मसौदे के सामने आने और 4 मार्च 1931 को कांग्रेस की वर्किंग कमेटी द्वारा उसके अनुमोदन के बाद लोग मायूस हुए, क्योंकि उसमें इस सवाल का कोई जिक्र नहीं था.

    सात मार्च को दिल्ली में एक सभा में शामिल गांधी से एक छपे पर्चे के जरिए सवाल हुआ, “क्या उनके प्रति आपको अपने कर्तव्य की याद है, जो फांसी के फंदे के इंतजार में हैं ?गांधी ने फांसी रोकने की मांग की लेकिन समझौते की शर्त के तौर पर नहींऐसा नहीं है कि गांधी ने इरविन से भगत सिंह और साथियों की फांसी रोकने की बात नहीं की. लेकिन वे इसे इरविन से समझौते की शर्त के तौर पर रखने को तैयार नहीं थे. 18 फरवरी को इरविन से उन्होंने कहा कि इसका हमारी वार्ता से कोई सम्बन्ध नहीं है. लेकिन अगर वर्तमान माहौल को आप बेहतर बनाना चाहते हैं, तो भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी को आपको टाल देना चाहिए.वायसराय का जवाब था कि सजा को बदला जाना तो मुश्किल है , लेकिन उसे टाले जाने पर विचार किया जा सकता है.” इरविन ने उसी दिन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को लिखा,”

    यद्यपि गांधी हमेशा से फांसी की सजा के विरोधी रहे हैं लेकिन उन्होंने सजा टाले जाने पर ही जोर दिया. उनका कहना था कि फांसी से अमन-चैन पर असर पड़ेगा.” गांधी ने दूसरी बार इरविन के सामने इस मसले को 19 मार्च 1931 को उठाया लेकिन जवाब नकारात्मक था. 20 मार्च को गांधी की होम सेक्रेटरी हर्बर्ट एमर्सन से भी इस मसले पर लम्बी बातचीत हुई. गांधी की 21 और 22 मार्च को इरविन से फिर भेंट हुई.गांधी का वो पत्र… मेरी स्थिति और कठिन न बनाइए23 मार्च 1931 की सुबह गांधी ने इरविन को एक पत्र में लिखा, “आपको यह पत्र लिखना आपके प्रति क्रूरता करने जैसा लगता है, पर शांति के हित में अंतिम अपील करना आवश्यक है. यद्यपि आपने मुझे साफ-साफ बता दिया था कि भगत सिंह और दो अन्य लोगों की मौत की सजा में रियायत दिए जाने की कोई आशा नहीं है, फिर भी आपने मेरे शनिवार के निवेदन पर विचार करने को कहा था. डॉक्टर सप्रू मुझसे कल मिले थे और उन्होंने मुझे बताया था कि आप इस मसले पर चिंतित हैं और आप कोई रास्ता निकालने पर विचार कर रहे हैं. यदि इस पर पुनः विचार की गुंजाइश है, तो आपको ध्यान दिलाना चाहता हूं कि जनमत सही है या गलत लेकिन वह सजा में रियायत चाहता है. जब कोई सिद्धान्त दांव पर न हो, तो लोकमत का मान करना हमारा कर्तव्य हो जाता है.

    इस मामले में अगर सजा हल्की हो जाती है तो बहुत संभव है कि आंतरिक शांति स्थापना में सहायता मिले. यदि मौत की सजा दी गई तो निःसंदेह शांति खतरे में पड़ जाएगी.चूंकि आप शांति स्थापना के लिए मेरे प्रभाव को, जैसा भी वह है, उपयोगी समझते प्रतीत होते हैं, इसलिए अकारण ही भविष्य के लिए मेरी स्थिति और कठिन न बनाइये. यूं भी वह कुछ सरल नही है. मौत की सजा पर अमल हो जाने के बाद यह कदम वापस नही लिया जा सकता. यदि आप सोचते हैं कि फैसले में थोड़ी भी गुंजाइश है, तो मैं आपसे यह प्रार्थना करुंगा कि इस सजा, जिसे फिर वापस लिया जा सकता है, आगे और विचार करने के लिए स्थगित कर दें. यदि मेरी उपस्थिति आवश्यक हो तो मैं आ सकता हूं. यद्यपि मैं बोल नही सकूंगा ( उनका मौन का दिवस था ), पर सुन सकता हूं और जो कुछ कहना चाहूंगा, लिखकर कहूंगा.दया कभी निष्फल नहीं जाती.क्या गांधी की सहायता से प्राण बचाना भगत सिंह स्वीकार करते ?फांसी नहीं रुकी. 24 मार्च के तय समय से लगभग ग्यारह घंटे फैले 23 मार्च को शाम 7.33 तीनों वीर सपूतों को फांसी दे दी गई. रात में ही सतलज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया. लोगों में फांसी को लेकर भारी गुस्सा था.

    गांधी से भी प्रबल शिकायतें थीं. लेकिन इन सबसे अलग बड़ा सवाल था कि क्या भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु फांसी से बचना चाहते थे ? क्या इसके लिए उन्हें कोई शर्त कुबूल होती? महात्मा गांधी के प्रति आदर रखते हुए भी वैचारिक तौर पर असहमति के कारण क्या उनकी सहायता से प्राण बचाना उन्हें स्वीकार होता?असलियत में सजा टालने की कोशिशों से सरदार भगत सिंह बेचैन थे. वे क्या चाहते थे, इसका उत्तर 20 मार्च 1931 को पंजाब के गवर्नर को लिखे उनके पत्र से मिलता है ,” जहां तक हमारे भाग्य का सवाल है, मैं यह कहना चाहता हूं कि जब तुमने हमे मौत के घाट उतारने का फैसला कर लिया है तो तुम यकीनन ऐसा ही करोगे. तुम्हारे हाथ में शक्ति है और संसार में शक्ति ही सबसे बड़ा औचित्य है. हम जानते हैं कि जिसकी लाठी उसकी भैंस कहावत ही तुम्हारा मार्ग निर्देशन करती है. हमारा पूरा अभियोग इसका प्रमाण है. यहां हम कहना चाहते हैं कि तुम्हारे न्यायालय के कथनानुसार हमने एक युद्ध का संचालन किया, इसलिए हम युद्ध बन्दी हैं और हम कहते हैं कि हमारे साथ वैसा ही व्यवहार हो अर्थात हम कहते हैं कि कि हमे फांसी चढ़ाने की जगह गोली मार दी जाए

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