
भारत में सिर्फ तीन दिनों के लिए ही कोयला बचने की बात कही जा रही है। दिल्ली में सरकार ने गुप्प अंधेरा छाने का अंदेशा जताया है, वहीं चीन कई कई राज्य पहले से ही अंधेरे में जा चुके हैं और अफरातफरी मची हुई है। यूरोपीय देशों में गैस की किल्लत ने मानो महंगाई का नल खोल दिया है और लेबनान में अब बिजली बची ही नहीं है। ऐसे में सवाल ये उठ रहे हैं कि आखिर ये माजरा क्या है?

इस साल दिसंबर में दुनिया भर के तमाम नेता जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग को लेकर होने वाली विश्व की सबसे बड़ी बैठक सीओपी-26 में हिस्सा लेने वाले हैं, जिसमें हरित क्रांति को लेकर बात होगी और ग्रीन एनर्जी क्रांति लाने की बात की जाएगी, लेकिन अभी से ये सवाल उठने लगे हैं, कि क्या ये संभव है।

ऊर्जा संकट आज अचानक नहीं आया है, बल्कि पिछले 18 महीने से धीरे-धीरे ऊर्जा संकट गहराता जा रहा था। कोविड-19 पर नियंत्रण के साथ ही अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के कार्यक्रम तेजी से शुरू हो गये, तो दूसरी तरफ पिछले 18 महीने में दुनियाभर के कई हिस्सों में भयानक तूफान आए हैं, जिसने स्थिति बिगाड़ने में बुरी तरह से भूमिका निभाई है।