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    पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में डिप्रेशन के मामले बढ़े इस उम्र के बाद हार्मोन्स बिगाड़ते हैं…

    By Tv 36 HindustanOctober 8, 2024No Comments6 Mins Read
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    नई दिल्ली:– मानसिक स्वास्थ्य
    लेंस के कारण डिप्रेशन का शिकार होती हैं, लेकिन उन्हें इसकी जानकारी नहीं होती। परिवार के लोग भी उनकी मेंटल हेल्थ पर ध्यान नहीं देते। जब तक मामला हद से ज्यादा न बढ़ जाए तब तक इसे ऐसी ही चलने दिया जाता है। बल्कि परिवार के लोग महिला को ही दोषी मानते हैं कि उसके व्यवहार के कारण परिवार की शांति भंग होती है।

    महिलाओं के मूड, व्यवहार, फिजिकल और मेंटल हेल्थ पर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन्स का बहुत असर रहता है। पीरियड्स शुरू होने से लेकर प्रेग्नेंसी, पोस्ट प्रेग्नेंसी, मेनोपॉज हर स्टेज में महिलाओं के हार्मोन्स उनकी पर्सनैलिटी को प्रभावित करते हैं। हार्मोन्स का संतुलन जितना ज्यादा बिगड़ता है, महिला का मूड और व्यवहार भी उसी के अनुरूप बदलता है। ओवेल्यूशन पीरियड में भी एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है और महिला के मूड और व्यवहार को प्रभावित करता है। यानी फर्टिलिटी पीरियड में भी महिलाओं पर हार्मोन्स का असर ज्यादा होता है।

    40 के बाद जब महिलाओं का पेरीमेनोपॉज फेज शुरू होता है तो सबसे पहले उनके पीरियड्स डिस्टर्ब होते हैं। कुछ महिलाओं को हेवी पीरियड्स होते हैं तो कुछ का ब्लड फ्लो कम हो जाता है। कभी पीरियड्स जल्दी आ जाते हैं तो कभी 2-3 महीने तक नहीं आते। हॉट फ्लैश शुरू हो जाते हैं। पैरों की नसें खिंचने लगती हैं। इसका असर महिलाओं के मूड और व्यवहार पर भी पड़ने लगता है। कभी अकेलापन तो कभी उदासी महसूस होती है, कभी रोना आता है, महिला खुद नहीं समझ पाती कि आखिर उसे हुआ क्या है।

    कुछ महिलाओं को ‘एमटी नेस्ट सिंड्रोम’ घेर लेता है। बच्चे जब घर से दूर पढ़ाई करने या करियर बनाने जाते हैं तो महिलाओं के लिए उनसे दूर रहना मुश्किल हो जाता है। वर्किंग वुमन के मुकाबले घर में रहने वाली महिलाएं ‘एमटी नेस्ट सिंड्रोम’ का शिकार ज्यादा होती हैं। बच्चों के जाने के बाद उन्हें समझ नहीं आता कि अब वो दिनभर क्या करेंगी। वर्किंग वुमन के मन में ये बातें आती हैं कि किसी को उनकी फिक्र नहीं है।

    मेनोपॉज को लेकर अभी भी जागरूकता नहीं है। इसके कारण पुरुष समझ नहीं पाते कि आखिर पत्नी को हुआ क्या है। बीवी की उदासी, चिड़चिड़ापन, गुस्सा उन्हें परेशान कर देता है। पत्नी को समझने के बजाय पति आरोप लगाते हैं कि पत्नी के कारण उनकी जिंदगी में अशांति है। बच्चों को भी मां में आया बदलाव समझ नहीं आता। पति और परिवार के सदस्य समझते हैं कि महिला बदल गई है, लेकिन उसके साथ क्या हो रहा है ये कोई नहीं समझ पाता।

    जानकारी का अभाव और लापरवाही के कारण ही महिलाओं में डिप्रेशन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। पति ऑफिस से चिढ़कर आते हैं तो पत्नी उनकी मानसिक स्थिति को समझते हुए गुस्से का कारण पूछती है। उनके साथ समय बिताती है। लेकिन जब पत्नी गुस्से में या उदास रहती है तो अधिकतर पति उस पर ध्यान भी नहीं देते। पति की अनदेखी पत्नी को ज्यादा परेशान करती है। उसे लगता है कि वो पति और परिवार के लिए चाहे खुद को कितना भी खपा ले, फिर भी किसी को उसकी कद्र नहीं है।

    मेनोपॉज फेज में जब पत्नी डिप्रेशन से जूझ रही होती है तो इसका असर कपल के रिश्ते पर भी पड़ता है। शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम होने से महिला की सेक्शुअल डिजायर कम होती जाती है। इससे पति को खीझ होने लगती है और रिश्ते में दूरियां बढ़ने लगती हैं।

    इस समस्या पर लड़ने-झगड़ने से अच्छा है कि एक्सपर्ट की सलाह ली जाए। एक्सपर्ट आपकी समस्या का समाधान करेंगे ताकि पति-पत्नी का फिजिकल रिलेशन फिर से अच्छा हो जाए।

    40 की उम्र के बाद एस्ट्रोजन हार्मोन कम होने के कारण अचानक महिला का मोटापा बढ़ने लगता है। चेहरे पर बाल उगने लगते हैं। अब वह पहले की तरह खूबसूरत नहीं दिखती। चेहरे पर झुर्रियां आने लगती हैं। इससे महिला का कॉन्फिडेंस कम होने लगता है। उसे लगता है कि अब उसकी अहमियत कम हो गई है। पति अब उसे पहले की तरह प्यार नहीं करते।

    ऐसी स्थिति से बाहर निकलने के लिए काउंसलिंग बहुत जरूरी है। महिलाओं को बढ़ती उम्र की गरिमा को स्वीकार करना चाहिए। इससे उनका कॉन्फिडेंस कम नहीं होगा।

    मां प्यूबर्टी पीरियड में बेटी का पूरा ध्यान रखती है। पीरियड्स शुरू होने से पहले ही उसे मानसिक रूप से तैयार करती है। अब स्कूल में भी लड़कियों को पीरियड्स की जानकारी दी जाने लगी है। लड़कियां खुद पीरियड्स के बारे में बेझिझक बात करने लगी हैं।

    लेकिन मेनोपॉज फेज में महिलाओं का कोई ध्यान नहीं रखता। मेनोपॉज के बारे में अभी भी जागरूकता की कमी है। खुद महिलाएं इसके बारे में ठीक से नहीं जानतीं। कुछ शहरी जागरूक महिलाओं को छोड़ दें, तो ज्यादातर महिलाओं को मेनोपॉज के बारे में सिर्फ इतना पता होता है कि एक उम्र के बाद उनके पीरियड्स बंद हो जाएंगे। लेकिन इसका उनके शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर होगा इसकी जानकारी उन्हें नहीं होती।

    महिलाओं को डिप्रेशन से बचाने के लिए उनके मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना और जागरूकता फैलाना। घर की देखभाल करने वाली महिला की मेंटल हेल्थ का ध्यान रखना परिवार की जिम्मेदारी है।

    महिलाएं जिस तरह पीरियड्स पर खुलकर बात करने लगी हैं उसी तरह उन्हें मेनोपॉज के दौरान होने वाली समस्याओं को लेकर भी मुखर होकर बात करनी चाहिए। सबसे पहले महिलाएं खुद अपने शरीर की समस्याओं को समझें, फिर पति और परिवार को इसके बारे में बताएं। बात करने से समस्या का समाधान जरूर निकलेगा।

    जिस तरह आप बड़ी उम्र में भी मेकअप करना, फैशनेबल कपड़े पहनना नहीं छोड़तीं, उसी तरह अपनी सेहत का ध्यान रखना भी न छोड़ें। जिस तरह आप रिटायरमेंट की तैयारी पहले ही कर लेती हैं उसी तरह मेनोपॉज के दौरान अपनी मेंटल हेल्थ के लिए खुद को तैयार कर लें। घर की महिलाएं एक दूसरे की स्थिति को समझें।

    खुद को दूसरों पर इतना निर्भर न रखें कि आप अकेले कुछ न कर सकें। अपने शौक के लिए समय निकालें। फिटनेस पर ध्यान दें। दोस्तों के साथ समय बिताएं। उनके साथ घूमने जाएं। आप मेनोपॉज के लिए जितनी तैयारी रखेंगी 40 के बाद मेंटल हेल्थ से जूझने का आपका सफर उतना आसान होगा।

    उदासी, चिड़चिड़ा, निराशा, किसी चीज में मन न लगना, किसी से बात करने की इच्छा न होना, भूख न लगना या ज्यादा खाना, नींद न आना या बहुत ज्यादा सोना, हर समय थकान महसूस करना, खुद को नाकारा समझना, किसी भी काम में फोकस न कर पाना, आत्मविश्वास की कमी, आत्महत्या का खयाल आना, ये सब डिप्रेशन के लक्षण हैं। यदि घर की महिला में ये लक्षण दिखाई दें तो एक्सपर्ट से मिलकर उनकी काउंसलिंग कराएं। जरूरत हो तो इलाज कराएं।

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