नई दिल्ली:- दिल्ली चुनाव पूर्ण बहुमत से जीतने के 10 दिन बाद भी बीजेपी में कौन बनेगा मुख्यमंत्री, इस पर मंथन चल रही है. दिल्ली की जनता ने बीजेपी, कांग्रेस या फिर आम आदमी पार्टी सबको सत्ता में आने का अवसर दिया है. इस बार 27 साल बाद एक बार फिर दिल्ली की जनता ने बीजेपी पर वही भरोसा जताया, जैसा वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में जताया था. दिल्ली विधानसभा का पुनर्गठन होने के बाद 6 नवंबर 1993 को पहला विधानसभा चुनाव हुआ था. बीजेपी ने राम मंदिर आंदोलन की लहर में एकतरफा जीत हासिल की थी. हालांकि 5 साल के कार्यकाल में नौबत ऐसी आई कि बीजेपी को तीन बार मुख्यमंत्री बदलने पड़े. उसके बाद वर्ष 1998 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी से सत्ता छीन ली.
राजनीतिक विश्लेषक जगदीश ममगांई के अनुसार वर्ष 1993 से 1998 के बीजेपी के शासन काल मे जिस तरह अलग-अलग मुख्यमंत्री बदलने की नौबत आई, इस बार कुछ भी वैसा न हो, यह भी एक कारण है कि स्वच्छ छवि वाले का नाम तय करने में पार्टी विचार कर रही है. 1993 में बीजेपी ने 70 सीटों में से 49 सीटें जीती थीं. इस बार भी 48 सीटें जीतीं हैं. दिल्ली विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद बीजेपी अब सरकार बनाने जा रही है. दिल्ली विधानसभा का 1993 में गठन हुआ था और राष्ट्रीय राजधानी में में उसी साल पहली बार विधानसभा चुनाव हुए थे. तब देश में राम मंदिर आंदोलन की गूंज चारों तरफ सुनाई दे रही थी. बीजेपी को इसका लाभ मिला और वर्ष 1993 में राम मंदिर के लिए चलाए गए जन जागरण अभियान का नतीजा रहा कि वर्ष 1993 के अंत में विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया.
मदन लाल खुराना बने बीजेपी के पहले सीएम: साल 1993 दिल्ली चुनाव में 58. 50 लाख मतदाता थे और 61.5 फीसद वोटिंग हुई थी. उस चुनाव में 1316 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे. यह भी अपने आप में एक रिकॉर्ड था. बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला, लेकिन पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदलने पड़े थे. वर्ष 1993 की विधानसभा चुनाव जीतने के बाद बीजेपी से सबसे पहले मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री बने थे. वह करीब 27 महीने ही पद पर रहे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. उसके बाद साहिब सिंह वर्मा मुख्यमंत्री बनाए गए. वे 31 महीने से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहे और अंत में बीजेपी की नेता सुषमा स्वराज 52 दिनों के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं थीं. उसके बाद 1998 में विधानसभा चुनाव हुए तो बीजेपी को हार मिली और कांग्रेस सत्ता में आ गई. वर्ष 1993 की विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं किया था. उस समय दिल्ली की सियासत में मदन लाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा और केदारनाथ साहनी की तूती बोलती थी.
मदनलाल खुराना पर हवाला से जुड़ें होने का लगा आरोप: 2 दिसंबर 1993 को मदनलाल खुराना ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. वह ऐतिहासिक दिन था. लेकिन उस समय जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मदन लाल खुराना पर हवाला से जुड़ें होने के आरोप लगाए थे. उन्होंने कहा कि एक दलाल और हवाला कारोबारी सुरेंद्र जैन ने 1991 में बीजेपी के वरिष्ठ नेता का नाम लिया था, साथ ही आरोप लगाया कि सुरेंद्र जैन के पास मिली लाल डायरी में मदनलाल खुराना का भी नाम था. इस आरोप के बाद मदनलाल खुराना पर मुख्यमंत्री पद छोड़ने का दवाब बढ़ा. तब लालकृष्ण आडवाणी की सलाह पर मदनलाल खुराना ने इस्तीफा दे दिया. 22 फरवरी 1996 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया.
खुराना की जगह साहिब सिंह वर्मा बने दूसरे सीएम: मदनलाल खुराना की जगह विधायक दल के निर्णय के आधार पर बीजेपी में जाट नेता साहिब सिंह वर्मा ने 26 फरवरी 1996 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. मदनलाल खुराना की सरकार में साहिब सिंह वर्मा शिक्षा व विकास मंत्री थे. अब वे मुख्यमंत्री बन गए. जिससे बीजेपी के मन में उन्होंने अपने कामकाज से बेहतर छवि बना ली थी. हालांकि जब विधानसभा चुनाव नजदीक आया तो चुनाव से ठीक 50 दिन पहले साहब सिंह वर्मा को इस्तीफा देना पड़ा. कारण था, दिल्ली में अचानक प्याज की कीमत में बेतहाशा वृद्धि. इस पर कांग्रेस ने बीजेपी सरकार पर जमाखोरी के आरोप लगाए. 12 अक्टूबर 1998 को साहिब सिंह वर्मा ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उधर जैन हवाला से जुड़े मामलों में मदनलाल खुराना कोर्ट से बरी हो गए. हालांकि उसके बाद मदनलाल खुराना दिल्ली की राजनीति से दूर होकर केंद्र की राजनीति में चले गए. वह अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में कैबिनेट मंत्री बना दिए गए थे.
पांच साल के पहले कार्यकाल में तीसरी सीएम बनी सुषमा स्वराज: साहिब सिंह वर्मा के बाद दिल्ली की कमान संगठन की तेजतर्रार नेता सुषमा स्वराज को सौंपी गई. दिल्ली में 50 दिन बाद विधानसभा चुनाव होने थे और प्याज की महंगाई का मुद्दा बरकरार था. वहीं, महिला मुख्यमंत्री को चेहरा बनाकर पार्टी ने दिल्ली की महिलाओं को मन जीतने की कोशिश की और सुषमा स्वराज 12 अक्टूबर 1998 को मुख्यमंत्री बनी, इसका प्रस्ताव साहिब सिंह वर्मा ने ही रखा था. सुषमा स्वराज के नेतृत्व में ही 1998 का विधानसभा चुनाव लड़ा गया था. मगर बीजेपी सिर्फ 15 सीटें ही जीत सकी. कांग्रेस के नेतृत्व में शीला दीक्षित की सरकार बनी और उसके बाद लगातार 15 साल तक दिल्ली में कांग्रेस ने शासन किया. कांग्रेस के बाद 11 साल तक आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता में काबिज रही.
दिल्ली में मुख्यमंत्री के बेटे और बेटियां सक्रिय राजनीति में: अब 32 साल बाद वह मौका दोबारा आ गया है जब बीजेपी दूसरी बार पूर्ण बहुमत से और लगभग उतनी ही सीटों के साथ दिल्ली की सत्ता में वापसी करने जा रही है. खास बात यह भी है कि दिल्ली में बीजेपी की शासन काल में रहे तीनों ही मुख्यमंत्री की बेटे और बेटियां पार्टी की सक्रिय राजनीति में हैं. जिनमें से पहले मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना के बेटे हरीश खुराना इस बार मोती नगर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए हैं. तो वहीं, साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा नई दिल्ली सीट से विजय हुए हैं और उन्होंने अरविंद केजरीवाल को हराया है.