नई दिल्ली:- कठमुल्ला शब्द को लेकर इस समय जुबानी जंग चल रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को कठमुल्ला शब्द का इस्तेमाल का इस्तेमाल किया था. बहुत से इस्लामी नेताओं ने इस पर नाराजगी जताई है. नई पीढी के बहुत से लोगों ने इसे सुना भर होगा. इसका मायने नहीं जानते होंगे. इसका इस्तेमाल कट्टरपंथियों के लिए भी किया जाता है.
इसी तरह का एक शब्द प्रयोग में लाया जाता है- पोंगापंडित या फिर पोंगापंथी. ये शब्द भी बहुत से लोगों ने सिर्फ सुना होगा इसका मायने शायद न जानते हों. लोकभाषाओं से बनी हमारी भाषा का हम प्रयोग कुछ इस तरह से करते हैं कि सुनने वाले को उसके मायने समझ में आ ही जाता है. आमिर खान की फिल्म पीके में एक डॉयलाग था-‘तुम लोगों से बात करते समय चेहरा भी देखना होता है कि कह क्या रहे हो?’ हालांकि गहरे संप्रेषण वाली सभी भाषाओं-बोलियों का ये एक गुण भी होता है. इससे फायदा ये होता है कि कही गई बात के मायने समझ में आ जाते हैं.
बहरहाल, फिलहाल बात कठमुल्ला की करते हैं. मुल्ला या मौलवी या मौलाना इस्लाम में सम्मानित शब्द माना जाता है. मुल्ला किसी न किसी रूप में मौला से जुड़ा रहा होगा. जिसे बहुत सम्मानित कहे देव तुल्य माना जाता है. इज्जत की भावना से पढ़ाने वाले और धर्म की शिक्षा देने वालों को भी मौलवी मौलाना कहा जाने लगा. अभी भी मौलाना का इस्तेमाल पुराने लोग उसी तरह करते हैं जैसे किसी हिंदू को इज्जत देने के लिए पंडित कहा जाता है. पंडित से आशय पारंगत से भी होता है.
अब ये कठमुल्ला कहां से आया. इसकी ध्वनि ही व्युत्पत्ति का बोध करा देती है. काठ का मुल्ला. ऐसा मुल्ला जो खुद अपने दिमाग से सोचता न हो. उसे जितना बता दिया बस उतने पर ही कठमुल्ला डटा रहता है. कई जगहों पर ये मायने भी बताया गया है कि कठमुल्ला गलत तालीम देने वाले को भी कहा जाता है. हिंदूवादी लोग कठमुल्ला का इस्तेमाल कट्टरपंथियों के लिए भी करते हैं. कुछ लोग मानते हैं कि काठ की माला जपने वाले को कठमुल्ला कहा जाता है. लेकिन ये ठीक नहीं लगता. माला तो सिर्फ नंबर गिनने के लिए होता. जाप का उससे कोई मतलब नहीं लगता.
पोंगापंडित भी इससे बहुत अलग नहीं है. ये खिताब उन्हें दिया जाता है जिन्हें ज्ञान न हो और वे ज्ञान का प्रदर्शन कर रहे हों. या फिर अधकचरे ज्ञान पर फूले हुए हैं. हालांकि इसका इस्तेमाल लकीर के फकीर के पर्याय के तौर पर भी किया जाता है. ऐसे लोग जो सुनी सुनाई या फिर अप्रमाणित पुस्तकों से मिली जानकारी को ही सही मान लेते हैं और उसी पर डटे रहते हैं उन्हें भी पोंगापंथी ही कहा जाता है. खासतौर से हिंदू धर्म की किताबें तर्क की ओर ले जाती है. विचार ग्रहण करने के साथ उस पर अपने तर्कों पर कसने मंथन करने की बात की गई है. मतलब बिना खुद विचार किए कोई भी बात आंख मूंद कर मान लेने की मनाही है. जो ऐसा नहीं करते उन्हें भी पोंगापंथी कहा जाता है. वे आडंबर तो कर लेते हैं लेकन उन्हें मर्म की जानकारी नहीं होती लिहाजा उनके काम भी सफल नहीं होते.
