बालोद:- वैसे तो लोग प्रेत, प्रेतात्मा या फिर डायन नाम से ही डर जाते हैं लेकिन बालोद जिले के झिंका गांव के लोगों की आस्था ऐसी है कि ये डायन (परेतिन माता) को माता मानते हैं और इसकी पूजा करते हैं. सिकोसा से अर्जुन्दा जाने वाले रास्ते पर स्थित मंदिर को परेतिन दाई माता मंदिर के नाम से जाना जाता है. झिंका सहित पूरे बालोद जिले के लोग इसे परेतिन दाई के नाम से जानते हैं. नवरात्र में यहां विशेष अनुष्ठान की शुरुआत हो चुकी है और इस मंदिर में ज्योत भी जलाई गई है.
नवरात्र में विशेष आयोजन: चैत्र और क्वार नवरात्रि में परेतिन माता के दरबार में विशेष आयोजन किए जाते हैं. ज्योति कलश की स्थापना की जाती है और नवरात्र के 9 दिन बड़ी संख्या में भक्तों का तांता लगा रहता है. सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा और मान्यता आज भी इस गांव में कायम है. वर्तमान में 100 ज्योति कलश यहां पर प्रज्ज्वलित किए गए हैं.
झींका गांव की सरहद में बना परेतिन दाई पहले एक पेड़ से जुड़ा हुआ था. आज भी इस पेड़ के सामने शीश झुकाकर ही कोई आगे बढ़ता है. मान्यता है कि यहां पर जो कोई भी मनोकामना मांगते हैं, वो पूरी होती है. ऐसी मान्यता भी है कि परेतिन दाई सूनी गोद भरती हैं.
मां सबकी मनोकामना पूरी करती हैं. जिनके बाल गोपाल(बच्चा) नहीं होते, वो मन्नत मांगते हैं. हमारे पूर्वजों की ईष्ट देवी भी हैं. हमेशा सफेद कपड़े ही मां को पहनाए जाते हैं-नारायण सिंह,पंडा
परेतिन माता को चढ़ावा चढ़ाना जरूरी: ग्रामीण बताते हैं कि इस रास्ते से कोई भी मालवाहक वाहन या लोग गुजरते हैं और किसी तरह का सामान लेकर जाते हैं तो उसका कुछ हिस्सा मंदिर के पास छोड़ना पड़ता है. फिर चाहे खाने पीने के लिए बेचने वाले सामान हो या फिर घर बनाने के लिए उपयोग में लाया जाने वाले सामान.
श्रवण सिन्हा नाम के श्रद्दालु ने बताया कि ”यहां वाहन में जो भी कुछ सामान ले जा रहे होते हैं, उसमें से कुछ हिस्सा यहां चढ़ाना जरूरी है. कहते हैं कि कोई व्यक्ति अगर ऐसा नहीं करता है तो उसके साथ कुछ न कुछ अनहोनी होती है.’
चढ़ावा नहीं चढ़ाने पर हो सकती है अनहोनी: सब्जी व्यापारी नारायण सोनकर ने बताया कि जब भी यहां से गुजरते हैं तो सब्जियां माता को अर्पित करते हैं. इससे मां का आशीर्वाद बना रहता है. गांव के यदुवंशी (यादव और ठेठवार) मंदिर में बिना दूध चढ़ाए निकल जाते हैं तो दूध फट जाता है. ऐसा कई बार हो चुका है. ग्रामीण कहते हैं कि परेतिन दाई की पूजा करते हैं, क्योंकि मां हमारी रक्षा करती है और बच्चों को खुश रखती है.