नई दिल्ली:– जब कोई साथ नहीं देता है तो तब सिर्फ व्यक्ति की आस भगवान से ही होती है। विकट परिस्थिति से अगर कोई व्यक्ति को बाहर निकाल सकता है तो वह सिर्फ भगवान हैं। भगवान व्यक्ति को उसके संचित कर्मों के आधार पर फल प्रदान करते हैं। इसलिए भगवान की यदि कृपा पाना चाहते हैं तो सबसे पहले व्यक्ति को अपने कर्म अच्छे रखने होंगे। लेकिन, क्या आपको मालूम है जब भगवान किसी के साथ देते हैं तो व्यक्ति को 8 संकेत मिलने शुरू हो जाते हैं। प्रेमानंद जी महाराज ने अपने प्रवचन के दौरान ऐसी ही 8 संकेतों के बारे में बताया है। आइए जानते हैं जब भगवान साथ देते हैं तो कैसा एहसास होता है।
जब भगवान देते हैं साथ तो मिलते हैं यह 8 लक्षण
1) प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि भगवान आपके साथ हैं इसका पहला लक्षण है कि जब आपके मन में घोर अपराध करने वाले के लिए भी दया भावना आ जाती है। तो समझ लीजिए श्री हरि जी की कृपा आप पर है। किसी पर गुस्सा न आना और क्षमा करना यह भगवान का आपके साथ होना हरि कृपा पात्र है।
2) जब भगवान आपका साथ देते हैं तो दूसरा लक्षण है ऐसा व्यक्ति दूसरों के गुणों में दोष नहीं ढूंढेगा। ऐसा व्यक्ति कभी किसी के दोष नहीं ढुंढता।
3 ) जिस व्यक्ति पर भगवान की कृपा होती है वह बाहर और अंदर दोनों से पवित्र रहता है। वस्त्र आपके पवित्र होने चाहिए यह बाहरी पवित्रता है और सत्य भाव, निष्कपटता यह अंदर की पवित्रता है।
4) ऐसे कार्यों का अनुष्ठान नहीं करना चाहिए जिससे आपका भजन छूटे। जिस व्यक्ति पर भगवान की कृपा होता है वह कभी भी ऐसे काम कर ही नहीं सकता है।
5) जिस भी व्यक्ति पर भगवान की विशेष कृपा होगी वह अपने भजन का फल दूसरों को प्रदान करेगा। यानी वह अपने कल्याण से पहले दूसरो के हित के बारे में विचार करेगा।
6) प्रेमानंद जी कहते हैं कि भजन से अपने लिए कुछ भी नहीं चाहना ऐसी हिम्मत सिर्फ हरि कृपा पात्र पर होती है। दूसरों से कुछ भी चाह नहीं रखना और भजन करने से ही कोई सुख की आस न होना। बल्कि, भजन से सिर्फ भगवान की भक्ति मिलती रहे।
7) प्रेमानंद जी कहते हैं कि जब किसी भी प्रकार के मान सम्मान कीर्ति, पद प्रतिष्ठा के मिलने पर मन को असंतुष्ट हो जाना हरीकृपा का लक्षण है। प्रणाम, नमस्कार, जय हो ऐसा होने पर मन में असंतुष्ट हो जाना कि प्रभु आपकी जय की जगह हमें ऐसा न सुनना पड़े। मान प्रतिष्ठा जिसके लिए बड़े बड़े ललित रहते हैं हरि कृपा पात्र को विष की तरह चुभती है।
8 ) प्रेमानंद जी कहते हैं कि जब आपके मन में करुणा और मैत्री पर किसी से ममता नहीं रखनी हैं। अपने संबंधियों तक से ममता नहीं रखनी चाहिए।
