नई दिल्ली:- तिब्बती परंपरा में माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति प्राकृतिक कारणों से मरा है तो उसे आकाश में दफनाना चाहिए. उनका मानना है कि मृत्यु होने के बाद शरीर एक खाली बर्तन जैसा ही रह जाता है. इसलिए इसे आसमान में दफन करना पुण्य काम है. इस प्रक्रिया को तिब्बती में झटोर, कइल-खोर और तेन-चक कहा जाता है. माना जाता है कि इस प्रथा को बुद्ध ने स्थापित किया था.
झटोर का अर्थ है पक्षियों को दान देना. इस प्रक्रिया में मृत शरीर को पहाड़ों के एकदम ऊंचाई में खुला छोड़ दिया जाता है ताकि गिद्ध या कोई शिकारी पक्षी इसका सेवन कर सके. तिब्बती बौद्ध मान्यताओं के अनुसार मरने के बाद अपने शररी को प्रकृति को लौटा देना पुण्य का काम होता है.
झटोर की प्रक्रिया के लिए मृत शरीर को सबसे पहले धोया जाता है और फिर इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट दिया जाता है. इस प्रक्रिया को रोक्यापा यानी एक्सपर्ट्स ऊंचे और खाली जगहों पर करते हैं, जिसे झटोर स्थल भी कहा जाता है. इसके बाद गिद्धों को आकर्षित करने के लिए धूप जलाकर प्रार्थनाएं की जाती हैं.
तिब्बती प्रथा में व्यक्ति की मौत के बाद उसके शव को 3-5 दिनों तक घर पर रखा जाता है. इस दौरान कुछ भिक्षु घर पर आकर प्रार्थनाएं करते हैं और फिर शव को आसमान में दफनाने की तैयारी की जाती है. आसमान में दफनाने की प्रक्रिया में घर के लोग शामिल नहीं होते हैं. वे घर पर रहकर प्रार्थना करते हैं.
गिद्धों के शरीर को खा लेने के बाद जो हड्डियां बचती हैं उससे धार्मिक चीजें बनाई जाती हैं. वहीं शरीर की बची हुई खोपड़ी को कीमती पत्थरों, चांदी और नक्काशी से सजाया जाता है. इसके बाद खोपड़ी को मठों में पवित्र आसनों पर रखा जाता है. यह देवताओं को प्रसाद चढ़ाने के लिए बर्तन के तौर पर काम आता है.
बता दें कि झटोर की यह प्रथा उन लोगों के साथ नहीं की जाती जो आत्महत्या, किसी संक्रामक बीमारी या जहर से मरते हैं क्योंकि इससे जानवरों को खतरा पहुंच सकता है. इस तरह की स्थिति में अन्य अंतिम संस्कार के अनुष्ठान का इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा तिब्बत में अधिकतर क्षेत्रों की जमीन पथरीली है. ऐसे में कब्र खोदना भी कठिन होता है. इसलिए भी यह प्रथा काफी चलन में है.
