नई दिल्ली:– ओडिशा के पुरी में हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। इस वर्ष यह यात्रा 27 तारीख से शुरू होने जा रही है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का श्रृंगार करके भव्य रथों में बैठाकर यात्रा निकाली जाती है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की कई ऐसी मान्यताएं, कथाएं और रहस्य हैं, जो लोगों को हैरान कर देते हैं। यही कारण है कि हर साल निकलने वाली इस रथ यात्रा में भी लोग दूर-दूर से भारी संख्या में शामिल होने के लिए आते हैं। माना जाता है कि ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की मंदिर में स्थापित मूर्तियां अधूरी हैं, जिनकी लोग पूरी श्रद्धा पूर्वक पूजा करते हैं। लेकिन हर कोई जगन्नाथजी की अधूरी मूर्ति का रहस्य नहीं जानता है। आज हम आपको इसी बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं…
जगन्नाथ भगवान की अधूरी मूर्ति को लेकर एक कथा बताई जाती है कि एक बार नींद में भगवान कृष्ण राधा रानी का नाम पुकारने लगते हैं, जिसे सुनकर सभी पत्नियां चौंक जाती हैं। उनके मन में यह सवाल आता है कि आखिर श्रीकृष्ण राधा रानी को अभी तक क्यों नहीं भूले हैं। ऐसे में सभी पत्नियां माता रोहिणी के पास गईं और उनसे इस बारे में प्रश्न कर लगीं। सभी की जिद को देखते हुए रोहिणी भगवान कृष्ण और राधा रानी की कथा सुनाने के लिए तैयार हो गईं और सुभद्रा को उन्होंने द्वार पर पहरा देने के लिए कहा। जिसके बाद, सुभद्रा पहरे पर बैठ गई और किसी को भी अंदर प्रवेश नहीं करने दिया। सभी बड़ी ध्यान से माता रोहिणी द्वारा सुनाई गई कथा को सुन रहे थे। लेकिन थोड़े ही समय में वहां भगवान कृष्ण और बलराम वहां पहुंच गए।
सुभद्रा ने श्रीकृष्ण और बलराम को द्वार पर ही रोक लिया और अंदर प्रवेश करने से मना कर दिया। लेकिन राधा रानी और श्रीकृष्ण के कथा की आवाज बाहर तक भी सुनाई दे रही थी, जिसे सुभद्रा, बलराम और श्रीकृष्ण मुख्य द्वार पर खड़े होकर बहुत गौर से सुन रहे थे। कथा को सुनते-सुनते तीनों की ऐसी अवस्था हो गई कि ध्यान से देखने पर भी उनके हाथ-पैर ठीक से नजर नहीं आ रहे थे। इस अवस्था में देवऋषि नारद आ गए और वो तीनों की अवस्था को देखकर एकदम हैरान रह गए। उस समय नारद जी ने भगवान कृष्ण से कहा कि महाभाव में लीन मूर्ति के रूप में आप सामान्य लोगों को दर्शन देने के लिए भी पृथ्वी पर हमेशा विराजमान रहें। इस बात को भगवान ने स्वीकार कर लिया।
इस बात को पूरा करने के लिए कुछ समय बाद राजा इंद्र घुम्न एक कारीगर से यह तीनों मूर्तियां बनाने का आग्रह करते हैं। उस समय तीनों लोग के कुशल कारीगर भगवान विश्वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप लेकर आते हैं और राजा से कहते हैं कि वो भगवान नीलमाधव, सुभद्रा और बलराम की मूर्ति बना सकते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें एक शर्त माननी होगी। उन्होंने शर्त रखी कि वह 21 दिनों में मूर्ति बनाकर तैयार कर देंगे, लेकिन यह काम वो अकेले एक कमरे में करेंगे। इस बीच कोई भी कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा। राजा ने इस बात को स्वीकार कर लिया और फिर, भगवान विश्वकर्मा दरवाजा बंद करके मूर्ति बनाने लगे।
रोज कमरे से आरी, हथौड़ी, छैनी की आवाजें आती रहती थी। इससे लोगों को इस बात की संतुष्टि मिलती थी की अंदर मूर्ति बन रही है। लेकिन एक दिन कमरे से आवाज आनी बंद हो गई। ऐसे में राजा परेशान हो गए और उनके मन में तरह-तरह के ख्याल आने लगें। राजा को लगा की कहीं बूढ़े व्यक्ति को कुछ हो, तो नहीं गया। इसके बाद, सभी शर्तों को भूलकर राजा ने कमरे का दरवाजा खोल दिया। उसी वक्त भगवान वहां से गायब हो गए और कमरे में तीन मूर्तियां अधूरी बनी रह गईं। राजा को यह देखकर पश्चाताप हुआ और इसे ही भगवान की इच्छा समझकर जगन्नाथजी, सुभद्रा और बलभद्र की अधूरी मूर्ति मंदिर में स्थापित कर दी। तब से लेकर आज तक पुरी के मंदिर में भगवान की अधूरी मूर्ति की पूजा ही की जाती है।
हर 12 साल में जब अधिकमास या मलमास होता है तब, पुरी के जगन्नाथ मंदिर में नवकलेवर उत्सव भी मनाया जाता है। इसमें भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र की पुरानी मूर्तियों को बदलकर नई मूर्तियों को स्थापित किया जाता है। इन मूर्तियों को नीम की लकड़ी से बनाया जाता है। इस त्योहार को जगन्नाथ भगवान के शरीर त्यागने और नया शरीर धारण करने का प्रतीक माना जाता है।
