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    रेयर अर्थ के खेल में चीन का पतन तय क्या भारत बन रहा अगला सुपरपावर…

    By Tv 36 HindustanJuly 13, 2025No Comments5 Mins Read
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    नई दिल्ली:– चीन के दुर्लभ पृथ्वी तत्वों पर कब्जे ने भारत के लिए एक बड़ा मौका खोल दिया है. भारत अब अपनी प्राकृतिक संपदा का पूरा फायदा उठाकर औद्योगिक क्रांति की राह पर तेजी से दौड़ लगा रहा है. चीन की इस चाल ने भारत को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी है, खासकर इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV), नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा जैसे सेक्टर में. जानकारों का कहना है कि यह न सिर्फ भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा, बल्कि निवेशकों के लिए भी शानदार मौका लेकर आया है. आइए, इस पूरे मसले को और डिटेल से समझते हैं कि कैसे भारत इस स्थिति का फायदा उठा सकता है!

    दुनिया के दुर्लभ पृथ्वी बाजार पर चीन का राज चलता है. CNBC की रिपोर्ट के मुताबिक चीन करीब 90% रेयर अर्थ मैग्नेट्स की सप्लाई कंट्रोल करता है, जो इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, विंड टरबाइन और रक्षा सिस्टम में इस्तेमाल होते हैं. अप्रैल 2025 में चीन ने टर्बियम और डिस्प्रोसियम जैसे खास तत्वों की निर्यात नीति और सख्त कर दी, जिससे ग्लोबल सप्लाई चेन में हलचल मच गई. एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक चीन का खनन 51% और रिफाइनिंग 76% तक सिमट सकता है, क्योंकि दुनिया अब दूसरी जगहों की तलाश में है.

    मोतीलाल ओसवाल प्राइवेट वेल्थ के अमित गुप्ता ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि जियोपॉलिटिकल टेंशन भारत में नए सेक्टर को जन्म दे रहे हैं. गुप्ता बताते हैं कि पहले पर्यावरण चिंताओं की वजह से भारत रेयर अर्थ खनन से दूर रहा, लेकिन अब हालात बदल गए हैं. भारत के पास दुनिया के 8% रिजर्व हैं, जो करीब 6.9 मिलियन टन हैं. गुप्ता कहते हैं, “हमारे पास इतना रिजर्व है कि वो 250 गुना ज्यादा है, जो अभी खनन हो रहा है.” इससे भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी जगह बनाने का शानदार मौका मिल रहा है.

    भारत के पास क्या है खास?
    US जियोलॉजिकल सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, चीन के पास 44 मिलियन टन रेयर अर्थ रिजर्व हैं, लेकिन भारत के 6.9 मिलियन टन उसे तीसरे नंबर पर ला खड़ा करते हैं. EY की रिपोर्ट कहती है कि भारत के पास दुनिया के 35% बीच और सैंड मिनरल्स भी हैं, जो EV, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा में काम आते हैं. लेकिन स्टेटिस्टा के मुताबिक, 2012 से 2024 तक भारत की सालाना प्रोडक्शन सिर्फ 2,900 टन रही, जो बहुत कम है.

    CSIS की ग्रेसलिन बसकरण कहती हैं, “भारत चीन की जगह नहीं ले सकता, लेकिन वैकल्पिक सप्लाई सोर्स जरूर बन सकता है.” सरकार अब IREL (इंडिया) लिमिटेड और प्राइवेट सेक्टर के बीच साझेदारी, सब्सिडी और इंसेंटिव्स पर जोर दे रही है. उदाहरण के लिए, तटीय इलाकों जैसे आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में मोनाजाइट जमा हैं, जहां खनन बढ़ाने की योजना है.

    रेयर अर्थ भारत के तटीय इलाकों में खूब मिलते हैं, लेकिन अटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1962 के चलते मोनाजाइट को “प्रिस्क्राइब्ड सब्सटेंस” माना जाता है. इसके चलते खनन सिर्फ पब्लिक सेक्टर के लिए रिजर्व है, जिससे प्राइवेट कंपनियां इससे दूर रहीं. फाइनेंशियल एक्सप्रेस के मुताबिक, झारखंड, गुजरात और महाराष्ट्र में भी छोटे रिजर्व हैं, लेकिन इनका पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा.

    अब भारत को सिर्फ REE ऑक्साइड बनाना नहीं, बल्कि वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स जैसे रेयर अर्थ मेटल्स और मैग्नेट्स बनाना होगा. इसके लिए R&D, ग्लोबल पार्टनरशिप और खास इंडस्ट्रियल जोन की सख्त जरूरत है. सरकार इस दिशा में कदम उठा रही है, लेकिन रास्ता आसान नहीं है.

    ग्लोबल दोस्ती से मिलेगी मजबूती
    भारत ऑस्ट्रेलिया के साथ हाथ मिलाकर रेयर अर्थ सप्लाई चेन को मजबूत करने में जुटा है. ऑस्ट्रेलिया रेयर अर्थ का चौथा बड़ा प्रोड्यूसर है. मार्च 2022 में खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) और ऑस्ट्रेलिया के क्रिटिकल मिनरल्स ऑफिस के बीच MoU हुआ. इकोनॉमिक टाइम्स की 9 जुलाई की रिपोर्ट कहती है कि भारत ऑस्ट्रेलिया से रेयर अर्थ मिनरल्स के लिए गहरी बातचीत कर रहा है. न्यू साउथ वेल्स सरकार की मालिनी दutt कहती हैं, “भारत शुरुआती ब्लॉक ले सकता है और कंपनियों से टाई-अप कर सकता है.”

    CSIRO की अगुआई में 2026 तक चलने वाली रिसर्च पार्टनरशिप खनन से रिसाइक्लिंग तक का रास्ता दिखाएगी. भारत-ऑस्ट्रेलिया स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप और QUAD फ्रेमवर्क भी इसे सपोर्ट कर रहे हैं.

    2010 में चीन के निर्यात बंद करने से जापान को बड़ा झटका लगा था. उसने ऑस्ट्रेलिया के लिनास रेयर अर्थ्स में जापान-ऑस्ट्रेलिया रेयर अर्थ्स (JARE) के जरिए 450 मिलियन डॉलर लगाए. इससे जापान की चीन पर निर्भरता 90% से 58% (2022 तक) घट गई, जैसा कि क्वार्ट्ज बताता है. भारत भी इसी रणनीति को अपनाकर अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है.

    शुरू हुआ नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन
    2025 में शुरू हुआ NCMM खनन, प्रोसेसिंग और रिसाइक्लिंग पर फोकस करेगा, जैसा कि PIB कहता है. जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया 2030-31 तक 1,200 प्रोजेक्ट्स करेगा. 100 से ज्यादा मिनरल ब्लॉक की नीलामी, समुद्री पॉलीमेटालिक नोड्यूल्स की खोज और फ्लाई ऐश से खनिज रिकवरी के नियम आसान किए जा रहे हैं. एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस भी बनाया जाएगा, जो पॉलिसी और मिनरल लिस्ट को अपडेट रखेगा.

    IREL ने FY24 में 5.31 लाख टन प्रोडक्शन रिकॉर्ड किया. विशाखापत्तनम और भोपाल में मैग्नेट और मेटल बनाने शुरू किए गए हैं, जो BARC और DMRL में टेस्टिंग के लिए हैं. ओमान, वियतनाम, श्रीलंका और बांग्लादेश में रिसोर्स तलाशी जा रही है, लेकिन माइनिंग परमिट और पर्यावरण क्लियरेंस में देरी बाधा बनी है.

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