रायपुर:- रिजर्वेशन का मुद्दा एक बार फिर से गर्माने लगा है. विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त को मनाया जाने वाला है. विश्व आदिवासी की तैयारियों के बीच आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर प्रदेश का सियासी पारा गर्माएगा. विश्व आदिवासी दिवस के दिन सरकार को घेरने के लिए आदिवासी समाज से लेकर ओबीसी महासभा और विपक्षी कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया है.
रिजर्वेशन का मुद्दा गर्माएगा सियासी पारा: दरअसल आरक्षण संशोधन विधेयक 2022, जो लगभग 2 सालों से राजभवन में धूल फांक रहा है, लेकिन राज्यपाल अब तक उस पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं हैं. छत्तीसगढ़ विधानसभा ने 2 दिसंबर 2022 को 76% आरक्षण वाला ऐतिहासिक बिल पास किया, लेकिन राज्यपाल के दस्तखत अब तक नहीं हो पाए.
आरक्षण का आंकड़ा: छत्तीसगढ़ में ST को 32%, SC को 13%, OBC को 27% और EWS को 4% देने वाला यह बिल आज भी फाइलों में धूल खा रही है. यही वजह है कि विश्व आदिवासी दिवस इस बार सिर्फ सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि संविधानिक अधिकारों की हुंकार बनने जा रही है.
OBC महासभा ने दिखाए तीखे तेवर: OBC महासभा का कहना है कि उन्हें अभी भी महज 14% आरक्षण मिल रहा है, जबकि उनकी संख्या कहीं ज्यादा है. 24 जुलाई को महासभा ने रायपुर कलेक्टर और पिछड़ा वर्ग आयोग अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपा. महासभा ने राज्यपाल से जल्द हस्ताक्षर की मांग की.
आंदोलन की चेतावनी: ओबीसी महासभा का कहना है कि अगर आरक्षण नहीं तो आंदोलन तय है. संभाग अध्यक्ष हेमंत कुमार साहू का साफ आरोप है कि ओबीसी वर्ग को आज भी सिर्फ 14% आरक्षण मिल रहा है, जबकि उनकी जनसंख्या कहीं अधिक है. इससे शिक्षा, रोजगार और पदोन्नति में उन्हें भारी नुकसान झेलना पड़ रहा.
सर्व आदिवासी समाज: सर्व आदिवासी समाज ने भी ओबीसी की मांग का समर्थन करते हुए राज्य और केंद्र सरकार पर सीधा आरोप लगाया. अध्यक्ष बीएस रावटे ने दो टूक कहा कि 75 साल बाद भी अगर आदिवासी और OBC समाज को अपना हक मांगना पड़ रहा है, तो यह सरकार की विफलता है. सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर आदिवासी की परिभाषा क्या है? रावटे ने सरकार पर आदिवासियों के साथ उपेक्षा करने का आरोप लगाया. पूछा की जब संविधान ने आरक्षण का प्रावधान किया है, तो उसे लागू करने में देर क्यों हो रही है.
क्या आदिवासी हैं ‘मूल निवासी’: सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष बीएस रावटे ने केंद्र पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि 1957 में भारत और संयुक्त राष्ट्र ने माना कि भारत के मूल निवासी आदिवासी हैं, लेकिन 1987 में भारत सरकार ने यूएन में कहा कि यहां कोई आदिवासी नहीं हैं. यह दोहरा रवैया अब और बर्दाश्त नहीं होगा. अगर सर्टिफिकेट दिया जा रहा है, तो सरकार स्पष्ट करे कि आदिवासी की परिभाषा क्या है?
दीपक बैज ने दागा सवाल: पीसीसी चीफ अध्यक्ष दीपक बैज ने केंद्र और राज्य सरकार पर हमला बोला. दीपक बैज ने कहा कि जब हमारी सरकार थी, हमने ये बिल पास किया. लेकिन आज तक राज्यपाल के दस्तखत नहीं हुए. ये चुप्पी समझ से परे है. आज डबल इंजन की सरकार है, तो दस्तखत क्यों नहीं हो रहे?
