एक जीती जागती हुई कहानियां:जीवन का अंतिम सफ़र, जहां जाना सबको पड़ता हैं ।
कहानी ! कहानी !! कहानियां !!! बहुत ही खूबसूरत शब्द होने के साथ मनुष्य के जीवन में दिग्दर्शन कराने में अहम भूमिका निभाती हैं । वास्तव में हमारे जीवन से जुड़ी हुई कहानी, कविता , छंद , दोहा मुक्तक , संस्मरण और आलेख इत्यादि जब हम पढ़ते हैं तो मन में पुराने दिनों की यादें ताज़ा हो जाती हैं । कुछ वास्तविक जीवन पर आधारित रहती हैं तो कुछ काल्पनिक रहती हैं , जो कही ना कही हमारे जीवन से मेल खाती हैं ।

आज़ हम उपस्थित हैं , एक ऐसी हृदय स्पर्शी कहानी को लेकर जिसकी रचना का श्रेय श्रीमति शांति थवाइत , व्याख्याता को जाता हैं । कुछ दिन पहले ही उनके भ्राता रविशंकर थवाईत का आकस्मिक निधन हो गया था । जीवन चक्र की यादों को उन्होंने अपनी क़लम के माध्यम से लिपिबद्ध किया हैं और अपनी उदासी को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया हैं । बिल्कुल सत्य घटनाओं पर आधारित यह कहानी ‘ जीवन का अंतिम सफ़र•••’ हर उम्र के पाठकों के लिए ज्ञानरुपी माध्यम हो सकता हैं , जो जीवन के अनुभवों से होकर गुजरता हैं ।

शशिभूषण सोनी , चांपा
जीवन का अंतिम सफर••••जहां सबको जाना ही हैं •••
घर मे चारो ओर चीख पुकार मची थी । लोगो के आने का तांता लगा था । लोग संवेदना प्रगट कर रहे थे । पूरा घर लोगो से खचाखच भरा था ।सब अपनी अपनी बातो से मेरे बडे भैया फंदू भैया की बाते कर रहे थे , क्योकि आज मेरे भैया एक ऐसी दुनियां मे पहुंच गये हैं जहां से कोइ आता नही और न ही उस अदृश्य लोक के विषय मे कोइ जानता हैं । इन सबके बीच मै घर के एक कोने मे बैठे कर मन ही मन सोच रही थी कि काश मेरे भैया एक बार वापिस आ जाए और उनके साथ जो बीती हैं उसको बता जाए ।इसी काश को सोचते हुए मैने अपने जीवन मे उनके साथ बिताए हुए सभी घटना क्रम को अपनी आंखो के सामने एक चलचित्र की भांति घुमते हुए पाया ।
हम सात भाई-बहनों मे तीसरे नंबर पर थे मेरे रवि भैया । भैया बोलना उनको अच्छा नही लगता वो हमेशा हमको अपना नाम लेकर ही बुलावते थे इसलिए हम उसे घरेलू नाम ‘फंदू ‘ से पुकारते थे । बचपन से ही बहुत मेहनती ,कारण गरीबी परिस्थिति । जब वो कक्षा 10 मे थे पिताजी का देहांत हो गया ।घर मे कुछ आमदनी का साधन नही था ।सात भाई बहनो का भरापूरा परिवार कैसे पालन हो इसकी चिंता उसे हरदम रहती थी । बडे भाई के साथ मिलकर उसने पान दुकान की शुरुआत की ,एक छोटे से ठेले मे कमाई बहुत कम होती थी बहुत मुश्किल से दो वक्त की रोटी नसीब होती थी । बडे भैया ने बाजार बाजार जाकर पान के धंधा को आगे बढाना चाहा परंतु सफलता उतनी नही मिली । इसी बीच उसने डालडा से बनने वाले जेवर करधन आदि का घर मे निर्माण कार्य शुरु किया ।मां के सहयोग से धंधा अच्छा चल निकला । एक बहन की शादी हो गयी । घर व्यवस्थित ढंग से चलने लगा । इसी बीच डालडा से बनने वाला जेवर बंद हो गया अब फिर वही स्थिति आ गयी । सोच मे पड गये थे कि अब क्या करे ? परिवार बडा कमाई कम इसी कशमकश मे उन्होने एक योजना बनायी और मुहल्ले के एक होटल व्यवसायी के साथ मिलकर भैया ने नाश्ते के होटल की शुरुआत की ।होटल चल निकला लेकिन एक साल बाद उस लडके का विवाह हो गया तो पार्टनर सिप बंद हो गयी । तब भी भैया ने हार नही मानी और एक छोटे से पान ठेले मे आलू गुंडा बनाने की सोची उन्होने बिलासपुर मे कही देखा था कि एक व्यक्ती एक छोटे से पान ठेले मे होटल चला रहा था तो मै क्यो नही ? यह सोचकर उन्होने प्रेरणा लेकर यह काम शुरु किया ।मन मे डर भी था कि पता नही क्या होगा ? लेकिन होटल चल निकला और पूरे शहर मे फंदू आलू गुंडा प्रसिद्द हो गया ।इसी होटल की कमाई से घर का खर्चा चलता था । दिन-प्रतिदिन होटल तरक्की करते गया दुकान प्रसिद्द हो गया ।नये नये स्वादिष्ट चटनी के साथ गरमागरम आलू गुंडा चांपा शहर के कदंब चौक स्थित ठेले के चारो ओर खडे होकर आनंद से खाते लोगो का हुजूम दिखाई देता था ।
दिन बितने लगे । अपने कमाई से उन्होने घर संभाला ।भाइयो के सहयोग से जीवन अच्छे से गुजरते गया। हम बहनो को पढाया खिलाया पाला पोसा ।हमने उन्हे अन्न दाता का नाम दिया था ,क्योकि वो कभी घर मे अन्न की कमी नही होने देते थे ।
फंदू भैया 42 के हो गये छोटे भाई व बहनो की शादी हो गयी ।उन्होने सोच रखा था कि कभी शादी के बंधन मे नही बंधेगे लेकिन आखिरकार उन्होने अपनी गृहस्थी बसा लिया । एक बिटिया हुई प्यार से छोटी ( रीतिका) नाम रखा । छोटी बडी होती गयी , ज्ञपढाई मे अव्वल । उसका सपना डाक्टर बनने का था जी जान से वो पढने लगी । इसी बीच भैया को अटैक आया । एंन्जियो प्लास्टिक हुआ । सब कुछ फिर नार्मल हो गया लेकिन अब जिंदगी दवाई पर निर्भर हो गयी ।समय बीतता गया छोटी अब 12 वी पास कर ली । पूरे देश मे कोरोना का प्रकोप जारी था । पहली लहर व दूसरी लहर मे वह बचे रहे लेकिन तीसरी लहर मे वह अपने आपको बचा न सके । वेक्सीन लगवाना उसे गंवारा न था , मन मे डर बैठ गया कही कुछ साइड इफेक्ट न हो जाए । सबसे पहले उसे निमोनिया की शिकायत हुई । सांस लेने मे दिक्कत हुई । चांपा के मिशन अस्पताल गये वहां भर्ती किया गया । इलाज़ शुरु हुआ ।निमोनिया कब कोविड हो गया पता ही नही चला ।11 दिन बाद अटैक आया । डाक्टर ने बाहर भेज दिया । बिलासपुर ले गये ।एक ऐसे अस्पताल मे पहुंच गये जहां डाक्टर की मानवता मर चुकी थी । डाक्टरी पेशा केवल कमाई का जरिया था । एक दिन मे लाख रुपया से ज्यादा का बिल थमा दिये एक मिडिल क्लास परिवार के लिए इतना बिल पटाना बहुत मुश्किल था । एक दिन में लाख तो पता नही आगे कितना बिल बनता , फिर सेहत मे भी कोइ विशेष सुधार नही । जैसे तैसे वहां से डिस्चार्ज होकर रायपुर एम्स पहुंचे । रात 11 बजे वहां एडमिट हुए । सुबह उन्होने फोन से बात किया और अपने आक्सीजन खत्म होने की बात कही डाक्टर ने तुरंत सूचना दिया कि अटैक आया है , जल्दी आओ ।परिजन ( भैया) के पहुंचते तक वो चिर निद्रा मे जा चुके थे ।सब कुछ खत्म हो गया । डाक्टर के लिए वो एक मरीज थे लेकिन परिवार के लिए वो एक अनमोल हीरा थे जिसे खोने का गम हर कोइ के दिल मे था परंतु सबके सब बेबस लाचार थे । कोइ कुछ कर ही नही सकता था ।
सबसे पहले यह सूचना मुझे मेरे मोबाइल पर मेरे बेटे ने दी । मुझे तो कुछ समझ नही आ रहा था,कुछ सूझ नही रहा था कि घर मे कैसे सबको बताउं , मेरी बूढी मां को क्या बताउं•••? भाभियो को क्या बताऊं•••• ? बच्चो को क्या बताऊं ? मेरे चेहरे के हाव भाव से सबको एहसास हो गया कि जरुर कुछ अनहोनी हुई हैं । मेरी आंखो मे आंसू देख घर मे कोहराम मच गया , आने जाने वालो का तांता लग गया । प्रेम व्यवहार सबसे इतना कि पूरा शहर आने लगा कोरोना से न कोइ डर न भय ।लोगो के मन मे केवल इंसानियत की झलक दिखाई दे रही थी ।सुबह दस बजे से सबको इंतजार था कि भैया को कब घर लाया जाएगा । संशय बना हुआ था ।कभी अंतिम संस्कार रायपुर मे ही होगा बोलते तो कभी कुछ और खैर बहुत मशक्कत के बाद सूचना मिली की घर लाया जाएगा । बहुत सारी कानूनी अडचनो को पार करते हुए सबके सहयोग से आखिरकार भैया को घर लाने मे सफल हुए उनकी अंतिम इच्छा थी कि वो घर आए । अस्पताल मे बार बार यही वाक्य दोहराते कि मुझे घर जाना है घर जाना है । हम यह सोच कर संतुष्ट थे कि भैया कि अंतिम इच्छा तो पूरी हो रही हैं •• लेकिन बातचीत करते हुए नही आए बल्कि गहरी नींद मे लेटे हुए वो घर आए । अपने प्रिय जगह कदंब चौक के छोटे से दुकान को पार करते हुए शायद उन्होने सोचा होगा कि इस दुकान से मैने बहुत कुछ हासिल किया , वो एक मंदिर था उनके लिए ।जरुर उन्होने अपना शीश झुकाया होगा । घर के दरवाजे पर जब आए तब पी पी किट ओढे हुए उनका चेहरा मैने देखना चाहा पर कुछ दिखाई नही दिया क्योकि कोविड नियमो के तहत नियमो का पालन हो रहा था । मां की पुकार , भाभी-भतीजी की चित्कार , बेटी की आवाज , पत्नी का दहाड मार कर रोने की आवाज प्रियजनो की रोने की आवाज के बीच मेरा मन भी बहुत हुआ कि मै दहाड मार कर रोउं लेकिन मैने हिम्मत बांधे रखा ।मेरी बडी भतीजी ने मुझसे आग्रह किया था कि बुआ हमे इस विषम परिस्थिति का सामना करना हैं ।कदंब चौक से लेकर बाबा घाट तक भीड ऐसी मानो कोइ शहीद का अंतिम दर्शन करने को लोग लालायित हो । रात के नौ बजे थे लोगो के हुजूम के बीच अपने अंतिम सफर मे भैया रवाना हो चुके थे । भैया ने कभी बेटे व बेटी मे भेदभाव नही किया । उनके विचारो का सम्मान करते हुए हम परिवार वालो ने उनकी बिटिया छोटी से ही मुखाग्नी करवाया । अंतिम संस्कार मे पूरे कोविड नियमो का पालन हुआ । जब उनका अंतिम संस्कार हो रहा था तो उसी समय अजान की आवाज सबको कानो मे सुनाई दे रही थी । सचमुच वो एक पुण्य आत्मा थे ।
आज अंतिम सफर पर वो अकेले चले गये । हमने उन्हें भारीमन से विदा किया । मन ही मन हमने उनसे वादा किया कि अब आपकी जिम्मेदारी हम सबकी जिम्मेदारी । आप तो निर्मोही होकर चले गये , खैर आप भी क्या करते ,हम सब तो उस अदृश्य शक्ती की कठपुतली हैं जो हमे जैसा नचाता है हम नाचते हैं ।आपका किरदार खत्म हो गया चले गये उस अदृश्य लोक मे जहां से कोइ नही आता । ईश्वर से अब केवल एक ही प्रार्थना हैं कि अब आपको चिर शांति प्रदान करे । आप पितृ देवता के रुप मे हमारे घर की रक्षा करे ।
लेखिका : शांति थवाईत
प्रस्तुतकर्ता : शशिभूषण सोनी