
यादगार पल होली की – शशिप्रभा सोनी
टीवी -36 हिन्दुस्तान की होली विशेष रंगारंग प्रस्तुति
बुरा ना मानो होली हैं , रंगों की रंगोली हैं बुरा ना मानों होली है, बुरा ना मानो हैं ••• यह मधुर स्वर होली के अवसर पर आकाश में गुंजायमान हो ध्वनित हो रही थी रंग-बिरंगे रंगों से सराबोर होकर लोग एक-दूसरे के ऊपर रंगों की बौछार कर रहे थे । आजकल तो महिलाएं बालिकाएं होली पर बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं । इनकी कभी-कभी जीवन में ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं, जो सदा के लिएं यादगार मन में बन जाती हैं । मेरे साथ भी लगभग चार दशक पूर्व ऐसी ही घटनाएं घटित हुई थी । बचपन में शरारती होने के साथ-साथ पढ़ाई-लिखाई में मैं बहुत तेज़ थी । मैं लगभग दस वर्ष पूर्व की रही होगीं । अपने चाचाजी के साथ होली खेलने , नुक्कड़ गलियों को पार करते हुए हनुमान चौक , चांपा पहुंच थी ।

इस वार्ड में बोहरा और मुस्लिम जमात की मस्जिद भी हैं , पास में ही हिन्दुओं के दो-देवालय भी हैं । इस चौक में हिंदू-मुस्लिम एक मन , एक भाव तथा अपनत्व की भावना से सराबोर होकर एक-दूसरे संग मिलकर त्यौंहार को मनाते हैं । मैं एक-दुसरे को रंग पिचकारियां चलाते , गुलाल लगाते , नाचते और फाल्गुनी गीत गाते देखकर आनंदित थी । यहीं पर महिलाएं बच्चें पिचकारियां लिए और छत की मुंडेर से आते-जाते लोगों के काटूनी मुखौटे को देखकर एवं बत्तीसी निकाल निकालकर खुसुर-फुसुर करती देखकर मैं भी बेझिझक खुशीं में शरीक होने जा रही थी ।

रंग-बिरंगी खुशियों के इस फाल्गुन मास में आज सारे संप्रदाय को अपने आगोश में ले लिया । यही कारण हैं कि रंग से सने लोगों को पहचानना असंभव सा लगा । मैं खुशी और मस्तीं से अहृल्दित होकर निमग्न डुबी हुई थी ।
इसी दरमियान ख़ुशी से झूम रहें भंगेड़ी शराबी अपने नशें में नहायें उछल-कूद करते लड़के-लड़कियों के झुंड को हमारी ओर आते देखकर मैं ड़र गई और उल्टें पैर तेजी से देवांगन मुहल्लें की सकरी गलियों की तरफ़ भाग खड़ी हुईं । बदहवासी में घर वापस आने के बजाएं मैं भागती रही-भागती रही और वे शैतान लड़के मुझें दौड़ाते रहें और अंत में जब आवाज़ आनी बंद हो गई तो मैंने रुक-रुककर पीछे की ओर देखी और किसी को भी ना पाकर राहत की सांस ली थी लेकिन मेरे सामने एक नई मुसीबत आ गई ••• मैं अपने घर का रास्ता भूल गई थी और-जोर जोर से रोने लगी ?
गुनगुनी सी धूप में,
होली के दिन मिले पहली बार।
एक दूसरे को रंग लगाया,
जिंदगी में साथ रहने के रंग लग गया ।।

सुनियें सुनियें ,सुनियें आवाज चीर-परिचित घर के सामने वाले हमारे पड़ोसी शशिभूषण सोनी की थी । मुट्ठी में गुलाल की पुड़िया दबायें पीछें खड़ी था । मैंने भी होली की हार्दिक बधाई देते हुए मंगलकारी टीका भी शशिभूषण जी को लगाई । तब शशिभूषण जी ने भी वही किया किन्तु टीके की रेखा ने सूनी मांग की रेखाएं रंग-बिरंगे कलर से रंग दिया था और यह मेरे जीवन का सौभाग्य भी हैं कि मैं रंगों के प्रेम में ही जिंदगी भर के लिए अपनी 25-वें उम्र के बसंत में रंग गई और उन्हें ही पतिदेव के रुप में पाई ।

पिया का रंग और सुंदर-सी पिचकारी , प्रेम के रंग से जिंदगी भर के लिए रंग गई ।
लेखिका शशिप्रभा सोनी , पूर्व पार्षद नगर पालिका परिषद, चांपा