नई दिल्ली:– धर्मशास्त्रों, पुराणों और ज्योतिष के ग्रंथों में अनेक देवी-देवतों के साथ-साथ नदियों, पहाड़ों, समुद्र, जलाशयों, वृक्षों आदि की पूजा के भी विधान दिए हुए हैं। ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थ बृहत् पराशर होरा शास्त्र के पूर्व जन्म श्राप अध्याय में पिछले जन्मों के अशुभ कर्मों के कारण संतान उत्पत्ति में आ रही बाधाओं को दूर करने वाले कई उपाय दिए गए हैं, जिनमें कुंए, तालाब आदि का निर्माण तथा पीपल, बरगद जैसे वृक्षों को लगाने और उनकी पूजा का भी विधान है। इसके अतिरिक्त वास्तु शास्त्र के ग्रंथों में 27 नक्षत्रों के पेड़-पौधों के नाम दिए गए है। अपने जन्म नक्षत्र या जन्म राशि के अनुसार पेड़ लगाने की परंपरा पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत के कई राज्यों में है।
हरेला उत्सव का विशेष महत्व
उत्तराखंड में श्रवण माह से 9 दिन पूर्व आषाढ़ के महीने में प्रकृति की पूजा को समर्पित हरेला उत्सव मनाया जाता है, जिसमें जागरूक लोग पेड़-पौधे भी लगते हैं। इसी हरेला उत्सव से प्रेरित हो कर जुलाई के प्रथम सप्ताह में प्रतिवर्ष भारत सरकार के द्वारा 1950 से वन महोत्सव मनाया जा रहा है। 1950 के दशक में वृक्षारोपण को प्रोत्साहन देने के लिए तत्कालीन कृषि मंत्री के.एम.मुंशी ने वन महोत्सव का सूत्रपात किया था। आइए, इस वन महोत्सव के समय ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के माध्यम से जाने की ग्रहों और नक्षत्रों के कौन-कौन से पेड़-पौधे हैं और उनको लगाकर कैसे ग्रह शांति के उपाय किए जा सकते हैं।
ग्रहों से सम्बधित वृक्ष
वृहत् पराशर होरा शास्त्र के अध्याय 3, ग्रह स्वरुप अध्याय , श्लोक 40 और ४१ में सूर्य आदि ग्रहों के प्रभाव में आने वाले वृक्षों के विषय में कहा गया है।
सूर्य -दृढ़ काष्ट वृक्ष – मोटी लकड़ी के पेड़ जैसे शीशम , शाल आदि।
चंद्र – दूधवाले पेड़ , रसवाले पेड़ जैसे देवदारु , कटहल आदि
मंगल – कांटेदार वृक्ष -बबूल , खैर , कटुवृक्ष जैसे नीम
बुध – बिना फल वाले वृक्ष
गुरु – सभी फल वाले वृक्ष
शुक्र – फूल वाले वृक्ष
शनि – बिना फल और फूल के नीरस वृक्ष
जन्म कुंडली में जो ग्रह कमजोर या प्रतिकूल अवस्था में है उसके अंतर्गत आने वाले वृक्ष लगाकर उसके बुरे प्रभावों को कुछ कम किया जा सकता है।
नक्षत्रों के अंतर्गत आने वाले वृक्ष
हिन्दू ज्योतिष में भ-चक्र को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है। वास्तु शास्त्र के कुछ ग्रंथों में इन सभी 27 नक्षत्रों के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक पेड़ या पौधे का नाम दिया गया है। यदि हम अपने जन्म नक्षत्र के अनुसार पेड़ या पौधा लगते हैं और यथासंभव उसकी देखभाल करते हैं तो इसका शुभ प्रभाव पूरे जीवन में मिलता है।अश्वनी से ले कर रेवती तक 27 नक्षत्रों के अंतर्गत निम्नलिखित पेड़-पौधे आते हैं।
अश्वनी – अश्वथ , भारणी – मकरतरु, कृतिका – गूलर, रोहिणी – जामुन, मृगशिरा – खदिर , आर्द्र – कृष्ण वृक्ष, पुनर्वसु – पुनर्नवा, पुष्य – पीपल, अश्लेषा – नागवृक्ष।
मघा – वट वृक्ष , पूर्वाफाल्गुनी – पलाश , उत्तरफाल्गुनी – पाकड, हस्त – अरिष्ट वृक्ष, चित्रा – श्रीवृक्ष , स्वाति – अर्जुन , विशाखा – विवेक, अनुराधा- वकुल , ज्येष्ठा – अशोक।
मूल – सर्व वृक्ष , पूर्वाषाढ़ा – जामुन, उत्तराषाढ़ा – कटहल, श्रवण – अर्कवृक्ष, धनिष्ठा – शमी, शतभिषा – कदम, पूर्वाषाढ़ा – आम, उत्तराभाद्रपदा- महूक, रेवती – मधु वृक्ष – ।
पुराणों के अनुसार वृक्ष लगाने के उपाय
ज्योतिष और वास्तु के ग्रंथों के साथ-साथ पुराणों में ग्रह शांति, पितरों और देवताओं की प्रसन्नता के लिए अनेक प्रकार के पेड़-पौधे लगाने का विधान है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण, मनु स्मृति, भविष्य पुराण, पदम् पुराण, वराह पुराण, मतस्य पुराण और शिव पुराण आदि में पेड़-पौधे लगाने से आयु, बल, यश , संतान सुख , परलोक में पुण्य आदि की प्राप्ति होने के सम्बन्ध में कहा गया है। आषाढ़ के महीने में पीपल, बरगद, नीम, आवला, अशोक, तुलसी, बेल, पलाश आदि पेड़ लगाने से भगवान विष्णु, लक्ष्मी जी और अन्य देवी-देवता प्रसन्न होते हैं, ऐसा कई पुराओं में वर्णित है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य के लिए मदार, चन्द्रमा के लिए पलाश, मंगल के लिए खैर, बुध के लिए अपामार्ग, गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए गूलर और शनि के लिए शमी के पेड़ को लगाने का विधान है।
