
अभी साफ नही हुआ हैसच यही है कि पृथ्वी पर पानी कहां से आया इस बात की पुष्टि अभी नहीं हो सकी है. फिर भी सामान्य तौर पर युवा पृथ्वी पर उल्कापिंडों की बारिश से पानी आने की धारणा को ही स्वीकार किया जाता है.
लेकिन अपोलो युग में चंद्रमा से पृथ्वी पर लाए गए पत्थरों के नमूने इस धारणा को खारिज करने का संकेत दे रहे हैं.पृथ्वी के साथ शुरू से था पानीलॉरेंस लिवरमोर नेशनल लैबोरेटरी के शोधकर्ताओं की टीम के मुताबिक सबसे ज्यादा संभावित व्याख्या यही है कि पृथ्वी पर ही पानी बना था यानि यह पृथ्वी पर शुरू से ही था ना कि कहीं बाहर से आया था. लैबोरेटरी के कॉस्मोकैमिस्ट ग्रेग ब्रेनेका बताते हैं कि या तो पृथ्वी उसी पानी के साथ पैदा हुई थी
जो आज यहां हैं या फिर हमसे वह चीज टकराई थी पूरी तरह से पानी से बनी थी जिसमें कुछ और ज्यादा नहीं था.उल्कापिंडों से नहीं आ सकता है पानीब्रेनेका कहते हैं कि उनका कार्य इस संभावना को खत्म कर देता है कि पृथ्वी पर पानी उल्कापिंडों या क्षुद्रग्रहों के जरिए पहुंचा होगा और साथ ही इस बात के पक्के संकेत देता है कि पानी यहीं पर शुरू से रहा होगा. पृथ्वी पर इसके ऐतिहासिक संकेत बचे रहना बहुत मुश्किल है क्योंकि यह लगातार बदलाव से गुजरती रही है
.चंद्रमा की अनुकूलतापृथ्वी के इतिहास के लिए चंद्रमा एक बढ़िया स्थान है क्योंकि यह पुरातन काल से बदला नहीं हैं. यहां की चट्टानें वैसी ही हैं जैसी अरबों साल पहले थीं. चंद्रमा का निर्माण दो पिंडों के टकराने से बना था. इनमें से एक मंगल के आकार का पिंड था और दूसरा हमारी पृथ्वी से कुछ छोटा था इस टकराव से पृथ्वी और चंद्रमा बने थे. चंद्रमा पर बने रहे थे प्रमाणइस घटना के संकेत पृथ्वी पर समय के साथ बदलावों के साथ खो गए थे. लेकिन चंद्रमा में किसी तरह की प्लेट टेक्टोनिक और मौसमी बदलाव जैसा कुछ नहीं होता है ,
इसलिए यहां के या भूगर्भीय प्रमाण यहीं सुरक्षित रह गए थे. इसके बाद भी चंद्रमा पर हुए उल्कापिंडों के टकरावों की संभावना कायम थी, लेकिन नासा के अपोलो अभियान में लाए गए नमूने अपरिवर्तित ही पाए गए थे.इन नमूनों की अहमियतजायंट इम्पैक्ट अवधारणा के अनुसार 4.5 अरब साल पहले विशाल टकराव पृथ्वी और चंद्रमा के बहुते वाष्पशील पदार्थ गायब हो गए थे. इसी लिए इस प्रतिमान के अनुसार चंद्रमा इतना सूखा है, जबकि इसकी तुलना में सौरमंडल के दूसरे चंद्रमाओं में पानी है. खुद पृथ्वी भी काफी सूख सी गई थी. इस टकराव से पहले के इतिहास कीजानकारी केलिए शोधकर्ताओं ने चंद्रमा के नमूनों का अध्ययन किया जो 4.3 से 4.25 अरब साल पहले क्रिस्टल बने थे.
शोधकर्ताओं ने इन नमूनों के अध्ययन से पाया कि इनमें भी वाष्पशील पदार्थ कम ही थे यानि वाष्पशील पदार्थों की कमी पृथ्वी और थिया के टकराव से पहले भी थी और टकराव का इस कमी से कोई लेना देना नहीं था. इसका मतलब यही हुआ कि पृथ्वी और चंद्रमा पर अलग अलग वाष्पशील पदार्थों के वितरण पृथ्वी और थिया के टकराव होने से आए थे और चंद्रमा शुरू से ही इसी तरह की बिना वाष्पशील पदार्थों की संरचना वाला पिंड था. इसी से पृथ्वी पर पानी के पहले से होने का पता चलता है. यह अध्ययन PNAS में प्रकाशित हुआ है.