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    आखिर क्यों ब्रह्माजी को मिली झूठ बोलने की ऐसी सजा, आज तक भुगत रहें हैं गलती का दंड…

    By Tv 36 HindustanFebruary 6, 2025No Comments5 Mins Read
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    नई दिल्ली:– भगवान शिव को सांसरिक मोह माया से ऊपर माना जाता है। शिव के बारे में कहा जाता है कि उनका ना आरंभ है और ना ही अंत। शिव अंत और आरंभ से भी ऊपर हैं। शिव को सरलता प्रिय है। सरल लोगों का शिव हमेशा ही साथ देते हैं। शिव की न्यायप्रियता की शिव पुराण में मिलती है। शिव पुराण कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद हुआ, जिसे सुलझाने के लिए भगवान शिव प्रकट हुए थे। शिव पुराण की कहानी के अनुसार ब्रह्माजी ने झूठ बोलने की ऐसी गलती की, जिसके कारण उन्हें शिवजी ने ऐसा भयानक शाप दिया जिसकी सजा ब्रह्माजी कलियुग में भी भुगत रहे हैं। आइए, विस्तार से जानते हैं शिव पुराण की कथा।

    एक समय की बात है, एक बार विष्णुजी अपने सहायकों एवं अनुचरों सहित शेष शय्या पर शयन कर रहे थे, तब ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ब्रह्माजी स्वयं ही वहां जा पहुंचे और विष्णुजी को पुत्र कहकर पुकारा और कहने लगे- “हे पुत्र उठ, मुझे देख, मैं तुम्हारा ईश्वर और परमपिता परमात्मा हूं। मेरी आराधना करो।” ब्रह्माजी की बात सुनकर विष्णुजी को क्रोध आया लेकिन वे उसे दबाकर बोले- “आपका कल्याण हो लेकिन एक बात बताओ आपका मुख टेढ़ा क्यों हो गया है?” विष्णु जी ने ब्रह्मा के चौथे सिर को देखकर कहा। इस पर ब्रह्माजी ने कहा- ‘समय के फेर से तुम्हें अभिमान हो गया है। हे पुत्र ! मैं तुम्हारा संरक्षक ही नहीं हूं, किन्तु समस्त जगत का पितामह हूं।’ यह सुनकर विष्णुजी ने कहा- “आप स्वंय ही अपना बड़प्पन बता रहे हैं। आपके लिए किसी ने तो विनम्र शब्द नहीं कहे लेकिन आप स्वंय ही अपनी प्रशंसा किए जा रहे हैं।” विष्णु जी की बात सुनकर ब्रह्माजी बहुत क्रोधित हुए।

    ब्रह्माजी क्रोधित होकर बोले- ” सारा जगत तो मुझमें निवास करता है। तुम मेरे ही नाभि-कमल से प्रकट हुए हो और मुझसे ही ऐसी बातें करते हो? नन्दिकेश्वर कहते हैं कि जब इस प्रकार रजोगुण से मुग्ध उन दोनों महानुभावों में विवाद होने लगा, तब वे दोनों अपने को प्रभु कहते-कहते एक-दूसरे का वध करने पर उतारू हो गए और युद्ध छिड़ गया। हंस और गरुड़ पर बैठे दोनों अमर ईश्वर परस्पर युद्ध करने लगे, उनके वाहन भी लड़ने लगे। देवता आकाश से देखकर चिंतित होने लगे। युद्ध में ब्रह्माजी ने विष्णु जी पर कई भयानक प्रहार किए और इसक उत्तर में विष्णु जी ने भी कई प्रहार किए। इस भयानक युद्ध को देखकर समस्त सृष्टि कांप उठी।

    ब्रह्माजी क्रोधित होकर बोले- ” सारा जगत तो मुझमें निवास करता है। तुम मेरे ही नाभि-कमल से प्रकट हुए हो और मुझसे ही ऐसी बातें करते हो? नन्दिकेश्वर कहते हैं कि जब इस प्रकार रजोगुण से मुग्ध उन दोनों महानुभावों में विवाद होने लगा, तब वे दोनों अपने को प्रभु कहते-कहते एक-दूसरे का वध करने पर उतारू हो गए और युद्ध छिड़ गया। हंस और गरुड़ पर बैठे दोनों अमर ईश्वर परस्पर युद्ध करने लगे, उनके वाहन भी लड़ने लगे। देवता आकाश से देखकर चिंतित होने लगे। युद्ध में ब्रह्माजी ने विष्णु जी पर कई भयानक प्रहार किए और इसक उत्तर में विष्णु जी ने भी कई प्रहार किए। इस भयानक युद्ध को देखकर समस्त सृष्टि कांप उठी।

    ब्रह्माजी और विष्णु जी के प्रहार से सभी लोग दुखी हो गए। इनके पारस्परिक आघातों से देवता व्याकुल हो उठे और उन्होने कहा, आप दोनों ही अराजकता उत्पन्न करते हैं। अतः यह सारी सृष्टि शिवजी की है कि जिन त्रिशूलधारी की इच्छा बिना कोई एक तिनका भी इधर-से-उधर नहीं कर सकता। हम लोग शिवजी के पास जाते हैं। वो इस संकट के समय में हमारी सहायता करेंगे। सभी देवतागण ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। शिवजी को जब ब्रह्माजी और विष्णु जी के युद्ध के कारण का पता लगा, तो उन्हें इस युद्ध की समाप्ति के लिए एक परीक्षा लेने का निश्चय किया।

    भगवान शिव ने एक ज्योतिर्लिंग बनाया। उन्होंने कहा कि जो इसका आदि और अंत ढूंढ लेगा, वही श्रेष्ठ होगा। भगवान विष्णु ने पशु (सुअर) का रूप धारण किया और धरती और पाताल में जाकर ज्योतिर्लिंग का अंत ढूंढ़ने लगे। ब्रह्मा जी ज्योतिर्लिंग का रहस्य जानने आकाश की तरफ बढ़ते गए। दोनों देवताओं ने बहुत कोशिश की, लेकिन ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत नहीं मिला। अंत में विष्णु जी ने हार मान ली। उन्होंने शिव जी के सामने स्वीकार किया कि वह ज्योतिर्लिंग का अंत नहीं खोज पाए। जबकि ब्रह्मा जी को जीतने का एक उपाय सूझा और वे अपने साथ केतकी के फूल को साक्षी बनाकर लाए कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का अंत खोज लिया है।

    भगवान शिव तो प्रकृति के हर सत्य को जानने वाले हैं, तो भला उनसे ब्रह्मा जी का झूठ कैसे छुप पाता। उन्होंने केतकी के फूल से सत्य कहने को कहा लेकिन केतकी के फूल ने भी झूठ बोल दिया। इस पर भगवान शिव ने क्रोधित होकर ब्रह्मा जी से कहा-“एक झूठ बोलने वाला देवता सम्मानीय नहीं हो सकता इसलिए आप परमपिता बनकर भी श्रेष्ठ नहीं हैं।” यह कहकर शिव ने ‘भैरव’ नामक अपने एक अवतार को प्रकट किया। भैरव ने शिव की आज्ञा पाकर ब्रह्मा जी का पांचवा सिर काट दिया। शिव ने विष्णु जी को सत्य बोलने के कारण हर यज्ञ, हवन में पूजे जाने का वरदान दिया। वहीं, ब्रह्मा जी को किसी भी यज्ञ में न पूजे जाने का शाप दिया। इस शाप के प्रभाव से ही ब्रह्मा जी के केवल दो ही मंदिर हैं और यज्ञ, हवन में ब्रह्मा जी की पूजा नहीं की जाती। वहीं, झूठ बोलने के कारण केतकी का फूल भी भगवान शिव की पूजा में नहीं चढ़ाया जाता।

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