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    Home » कैल्शियम और सल्फर की कमी दूर करने खेतों में डालें जिप्सम
    छत्तीसगढ

    कैल्शियम और सल्फर की कमी दूर करने खेतों में डालें जिप्सम

    By Tv 36 HindustanOctober 11, 2021Updated:October 11, 2021No Comments5 Mins Read
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    किसान फसल उगाने के लिए सामान्यत: नत्रजन, फॉस्फोरस तथा पोटैशियम का उपयोग करते है, कैल्शियम एवं सल्फर का उपयोग नहीं करते है। जिससे कैल्शियम एवं सल्फर की कमी की समस्या धीरे-धीरे विकराल रूप धारण कर रही है, इनकी कमी सघन खेती वाली भूमि, हल्की भूमि तथा अपक्षरणीय भूमि में अधिक होती है। कैल्शियम एवं सल्फर संतुलित पोषक तत्व प्रबन्धन के मुख्य अवयवको में से है जिनकी पूर्ति के अनेक स्त्रोत है इनमें से जिप्सम एक महत्वपूर्ण उर्वरक है।

    युवा किसान किशोर राजपूत ने बताया कि रासायनिक रूप से जिप्सम कैल्शियम सल्फेट है, जिसमें 23.3 प्रतिशत कैल्शियम एवं 18.5 प्रतिशत सल्फर होता है। जब यह पानी में घुलता है तो कैल्शियम एवं सल्फेट आयन प्रदान करता है तुलनात्मक रूप से कुछ अधिक धनात्मक होने के कारण कैल्शियम के आयन मृदा में विद्यमान विनिमय सोडियम के आयनों को हटाकर उनका स्थान ग्रहण कर लेते है। आयनों का मटियार कणों पर यह परिर्वतन मृदा की रासायनिक एवं भौतिक अवस्था मे सुधार कर देता है तथा मृदा फसलोत्पादन के लिए उपयुक्त हो जाती हैं। साथ ही, जिप्सम भूमि में सूक्ष्म पोषक तत्वों का अनुपात बनाने में सहायता करता है।

    अपने खेतों में जिप्सम क्यों डालें

    कैल्शियम और सल्फर की आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए।
    फसलों में जड़ों की सामान्य वृध्दि एवं विकास में सहायता देता है।
    जिप्सम का उपयोग फसल संरक्षण में भी किया जा सकता है क्योंकि इसमें सल्फर उचित मात्रा में होता है।
    तिलहनी फसलों में जिप्सम डालने से सल्फर की पूर्ति होती है, जो बीज उत्पादन तथा पौधे व तेल से आने वाली विशेष गन्ध के लिए मुख्यतया: उत्तरदायी होता है।
    जिप्सम देने से मृदा में पोषक तत्वों सामान्यत: नत्रजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम तथा सल्फर की उपलब्धता में वृध्दि हो जाती है।
    जिप्सम कैल्शियम का एक मुख्य स्त्रोत है जो कार्बनिक पदार्थो को मृदा के क्ले कणों से बाँधता है जिससे मृदा कणों में स्थिरता प्रदान होती है तथा मृदा में वायु का आवागमन सुगम बना रहता है।
    जिप्सम मृदा में कठोर परत बनने को रोकता है तथा मृदा में जल प्रवेश को बढ़ाता है।
    कैल्शियम की कमी के कारण ऊपरी बढ़ती पत्तियों के अग्रभाग का सफेद होना, लिपटना तथा संकुचित होना होता है। अत्यधिक कमी की स्थिति में पौधों की वृध्दि अवरूध्द हो जाती है तथा वर्धन शिखा भी सूख जाती है जो कि जिप्सम ड़ालने से पूरी की जा सकती है।
    जिप्सम एक अच्छा भू सुधारक है यह क्षारीय भूमि को सुधारने का कार्य करता है।
    जिप्सम अम्लीय मृदा में एल्युमिनियम के हानिकारक प्रभाव को कम करता है।
    जिप्सम का उपयोग फसलों में अधिक उपज तथा उनकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए किया जाता है।

    खेतों में जिप्सम को कब और कैसे डालें

    जिप्सम को मृदा में फसलों की बुवाई से पहले डालते हैं। जिप्सम डालने से पहले खेत को पूर्ण रूप से तैयार करके (2-3 गहरी जुताई एवं पाटा लगाकर) जिप्सम का बुरकाव करें। इसके पश्चात्, एक हल्की जुताई करके जिप्सम को मिट्टी में मिला दें। सामान्यत: धान्य फसलें 10-20 किग्रा कैल्शियम प्रति हैक्टेयर एवं दलहनी फसलें 15 किग्रा कैल्शियम प्रति हैक्टेयर भूमि से लेती है और सामान्य फसल पध्दति 10-20 किग्रा प्रति हैक्टेयर कैल्शियम भूमि से लेती है।

    जिप्सम को क्षारीय भूमि में मिलाने के लिए आवश्यक मात्रा, क्षारीय भूमि की विकृति की सीमा, वांछित सुधार की सीमा तथा भू-सुधार के बाद उगाई जाने वाली फसलों पर निर्भर करती है। कितना सुधारक डालना है, इसकी मात्रा का निर्धारण करने के लिए सबसे पहले कितना जिप्सम डालने की आवश्यकता होगी, का निर्धारण किया जाता है। इसको जिप्सम की आवश्यकता (जिप्सम रिक्वायरमेन्ट या जी.आर.) कहा जाता है जिप्सम की उचित मात्रा जानने के लिए जिप्सम की विभिन्न मात्राओं को लेकर प्रयोग किये गये। इन प्रयोगों से यह प्रमाणित होता है कि धान की फसल के लिए जिप्सम की कुल मात्रा का एक चौथाई भाग काफी है। जबकि गेहॅँ की फसल के लिए यह कुल मात्रा से आधा पर्याप्त है तथा मैदानी क्षेत्रों में पाये जाने वाली क्षारीय मृदाओं के लिए लगभग 12-15 किग्रा प्रति हेक्टेयर जिप्सम का प्रयोग किया जाता है।

          क्षारीय भूमि सुधार के कार्यों को प्रारम्भ करने का सबसे उत्तम समय गर्मी के महीनों में होता है। जिप्सम फैलाने के तुरन्त बाद कल्टीवेटर या देशी हल से भूमि की ऊपरी 8-12 सेमी की सतह में मिलाकर और खेती को समतल करके मेढ़बन्दी करना जरूरी है ताकि खेत में पानी सब जगह बराबर लग सके। जिप्सम को मृदा में अधिक गहराई तक नहीं मिलाना चाहिए। धान की फसल में, जिप्सम की आवश्यक मात्रा को फसल लगाने से 10-15 दिन पहले डालना चाहिए। पहले 4-5 सेमी हल्का पानी लगाना चाहिए जब पानी थोड़ा सूख जाए तो पुन: 12-15 सेमी पानी भरकर रिसाव क्रिया सम्पन्न करनी चाहिए।

    क्षारीय-भूमि में जिप्सम को बार-बार मिलाने की आवश्यकता नहीं होती है। यह पाया गया है कि यदि धान की फसल को क्षारीय भूमि में लगातार उगाते रहें तो भूमि के क्षारीयपन में कमी आती हैं। खेतों को भी लम्बी अवधि के लिए खाली नहीं छोड़ना चाहिए।

    जिप्सम के उपयोग में ध्यान देने योग्य बातें

    जिप्सम को अधिक नमी वाले स्थान पर न रखें तथा जमीन से कुछ ऊपर रखें।
    मृदा परिक्षण के उपरान्त जिप्सम की उचित मात्रा डालें।
    तेज हवा बहने पर जिप्सम का बुरकाव न करें।
    जिप्सम डालने से पहले अगर इसमें ढेले हैं तो इन्हे महीन कर लें।
    जिप्सम का बुरकाव करते समय हाथ सूखे होने चाहिए।
    जिप्सम का बुरकाव पूरे खेत में समान रूप से डालें।
    जिप्सम डालने के पश्चात उसको मिट्टी में अच्छी प्रकार से मिला दें।
    जिप्सम को बच्चों की पहुँच से दूर रखें।

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