नई दिल्ली:– जहां एक ओर 13 और 14 जनवरी को पौष पूर्णिमा एवं मकर संक्रांति के दिन शाही स्नान हुआ था वहीं, अभी 4 तिथियां शेष हैं जिनमें 29 जनवरी माघ अमावस्या, 3 फरवरी बसंत पंचमी, 12 फरवरी माघ पूर्णिमा और 26 फरवरी महाशिवरात्रि शामिल हैं।
कुंभ में शाही स्नान का बहुत महत्व माना जाता है। इस साल प्रयागराज में 144 साल बाद महाकुंभ का आयोजन हुआ है। विशेष तिथियों पर शाही स्नान का मुहूर्त भी निकला है। जहां एक ओर 13 और 14 जनवरी को पौष पूर्णिमा एवं मकर संक्रांति के दिन शाही स्नान हुआ था वहीं, अभी 4 तिथियां शेष हैं जिनमें 29 जनवरी माघ अमावस्या, 3 फरवरी बसंत पंचमी, 12 फरवरी माघ पूर्णिमा और 26 फरवरी महाशिवरात्रि शामिल हैं। इन तिथियों को महाकुंभ में शाही स्नान के लिए अत्यंत पुण्यकर माना जा रहा है।
महाकुंभ में शाही स्नान को लेकर ऐसा माना जाता है कि इन विशेष तिथियों पर जिस भी व्यक्ति ने शाही स्नान कर लिया उसके जीवन में सुख-समृद्धि और सौभाग्य का आगमन होता है एवं उस व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। उसके पापों के कर्म फल से उसे छुटकारा मिलता है। शाही स्नान को लेकर एक ख़ास बात और भी है कि कुछ लोग इसे शाही कहते हैं तो कुछ अब इसे अमृत स्नान कहने लगे हैं। ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से आइये जानते हैं कि शाही और अमृत स्नान में क्या अंतर है।
शाही स्नान, जिसका अर्थ है ‘राजसी स्नान’, 19वीं शताब्दी में पेशवाओं के शासनकाल के दौरान प्रारंभ हुआ था। ‘शाही’ एक उर्दू शब्द है, जिसका अर्थ है राजसी या शाही। इसे विशेष रूप से कुंभ मेले के दौरान उन दिनों के लिए उपयोग किया जाता है, जब भक्तों का विश्वास होता है कि पवित्र नदियों में स्नान करने से उनके पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त होती है।
