रायपुर:- एकस्ट्रा मेरिटल अफेयर को लेकर छत्तीसगढ़ महिला आयोग सख्त है. ऐसे मामलों में महिला आयोग बाहरवाली को नारी निकेतन भेजने का फरमान जारी कर रहा है. यह वे महिलाएं हैं जो शादीशुदा पति पत्नी के बीच आती हैं और उनके परिवार को तोड़ने की कोशिश करती हैं. उन्हें सबक सिखाने के लिए महिला आयोग ने यह तरीका निकाला है.
हाल ही में महिला दिवस के अवसर पर महिलाओं के मान सम्मान अधिकार को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की गई. लेकिन समाज में महिलाओं का एक ऐसा तबका भी है जो महिलाओं से ही परेशान है. इन दिनों बाहरवाली के चक्कर में घरवाली परेशान है. कई घर टूट रहे हैं, तलाक के मामले देखने को मिल रहे हैं. यहां तक की कई बार बिना तलाक के ही पति बाहरवाली के साथ रह रहे हैं और पत्नी को घर से निकाल दे रहे हैं. इस तरह के मामलों में घरवाली के साथ बच्चे भी परेशान हो रहे हैं. ऐसे मामले छत्तीसगढ़ महिला आयोग और महिला थाना पहुंच रहे हैं.
रायपुर महिला थाने की प्रभारी मंजूलता सिंह बताती है कि थाने में लगातार घरवाली बाहरवाली की शिकायतें पहुंच रही है. इसमें काउंसलिंग की जाती है और कोशिश की जाती है कि परिवार टूटने से बच जाए. ज्यादातर मामलों में सफलता भी हाथ लगती है. काउंसलिंग के माध्यम से परिवार को बचाने की पूरी कोशिश रहती है. लेकिन जिन मामलों में सहमति नहीं बनती है, तो उन्हें न्यायालय जाने की सलाह दी जाती है.
हालांकि इस दौरान बच्चों की कस्टडी माता या पिता को दी जाएगी, इसको लेकर पुलिस को अधिकार नहीं दिए गए हैं. ऐसे मामलों में या तो आपसी सहमति से बच्चे को माता-पिता को दिया जाता है या फिर उन्हें गार्जियनशिप एक्ट के तहत न्यायालय जाने की सलाह दी जाती है.
महिला थाने के साथ ही छत्तीसगढ़ महिला आयोग में भी एकस्ट्रा मेरिटल अफेयर के मामले पहुंच रहे हैं. जिसमे महिला आयोग भी कोशिश करता है कि ऐसे मामलों में समझाइए देकर घर को टूटने से बचाया जा सके. इसके लिए महिला आयोग पति-पत्नी सहित बाहरवाली को भी सुनवाई के लिए बुलाता है और समझाइश देता है.
छत्तीसगढ़ महिला आयोग की अध्यक्ष किरणमयी नायक बताती है कि एकस्ट्रा मेरिटल अफेयर में यदि दूसरी औरत दोषी पाई जाती है, तो उसे सबसे पहले नारी निकेतन भेज दिया जाता है, ताकि वह सुधर जाए और उसे अपनी गलती का एहसास हो, और वो किसी और घर को बर्बाद ना कर सकें. ऐसी महिलाओं को नारी निकेतन में रोजगार से जुड़ा प्रशिक्षण भी दिया जाता है जिससे वह अपना रोजगार चला सके. फिर उनके घर वालों को बुलाकर उस महिला को सौंप किया जाता है.
महिला आयोग की अध्यक्ष बताती है कि ऐसे मामलों में बच्चों की कस्टडी को लेकर कई बातों का ध्यान रखा जाता है. बच्चे माता-पिता दोनों के साथ रहना चाहते हैं. यदि दोनों साथ रहने तैयार नहीं होते हैं, तो ऐसी स्थिति में बच्चे की कस्टडी किसे दी जाए, इसे लेकर कई बातों का ध्यान रखा जाता है कि कौन आर्थिक रूप से मजबूत है, कौन बच्चे की देखरेख अच्छे से कर सकता है, और उसे बच्चा दिया जाता है. हालांकि इस दौरान यदि बच्चा काफी छोटा है तो ऐसी स्थिति में बच्चों को मां से अलग नहीं किया जाता है.
वहीं कानूनी प्रक्रिया की बात की जाए तो महिला थाना और महिला आयोग के बाद यह मामला कुटुंब न्यायालय और न्यायालय पहुंच रहे हैं. एडवोकेट सुचित्रा बर्धन ने बताया कि आजकल फैमिली कोर्ट में 50 प्रतिशत एकस्ट्रा मेरिटल अफेयर के मामले ही आते हैं. ऐसे मामलों की शिकायत महिला आयोग ओर महिला थाना में की जाती है. जहां तीनों पक्ष पति-पत्नी और बाहरवाली को बुलाया जाता है. उनकी काउंसलिंग की जाती है और कोशिश की जाती है कि परिवार न टूटे. बावजूद इनके यदि समझौता नहीं होता है तो फिर मामला कुटुंब न्यायालय भेजा जाता है. जहां न्यायालय इन मामलों की सुनवाई कर फैसला सुनाते हैं.
एडवोकेट सुचित्रा बर्धन बताती है कि इस तरह के मामलों में सिर्फ संदेह के आधार पर कार्रवाई नहीं होती है. उसके लिए पुख्ता सबूत होना चाहिए. जिसमें फोटोग्राफ, वीडियो सहित ऐसी जानकारी जो या साबित कर सके की महिला के पति का संबंध किसी अन्य महिला से है तभी उस मामले में कार्रवाई हो सकती है. ऐसे मामलों में पीड़ित महिला तलाक सहित भरण पोषण और पति के खिलाफ कार्रवाई के लिए केस लगा सकती है.
एडवोकेट का कहना है कि ऐसे मामलों में सबसे ज्यादा परेशानी बच्चों को होती है. बच्चों की कस्टडी किसे दी जाए उसे लेकर कई बातों का ध्यान रखा जाता है. कौन बच्चे की देखरेख अच्छे से कर सकता है, कौन आर्थिक रूप से मजबूत है, इन बातों को ध्यान में रखते हुए बच्चे की कस्टडी माता या पिता को दी जाती है. लेकिन यदि बच्चा 7 साल से कम उम्र का है तो ऐसे मामलों में बच्चों की कस्टडी मां को दी जाती है.