नई दिल्ली: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक के बाद एक बड़ा दांव चल रहे हैं. पहले उन्होंने जातिगत जनगणना करवा कर अन्य राज्यों और पार्टियों को टेंशन दे दी थी. अब बिहार में अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाए जाने से जुड़े बिल को विधानसभा की मंजूरी मिल गई है. इसे ध्वनि मत के जरिए सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया.
लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने जिस रफ्तार में अपनी चालें चली है उससे न सिर्फ बीजेपी बल्कि अन्य विपक्षी पार्टियां भी दंग रह गई है. सबसे पहले सीएम नीतीश कुमार ने जातिगत सर्वे कराया. बीजेपी और अन्य विरोधी पार्टियां अभी जाति जनगणना में उलझे ही थे कि सीएम नीतीश ने आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी कर दी. इतना ही नहीं बिहार के मुख्यमंत्री ने सर्वेक्षण के कुछ ही दिनों में कैबिनेट मीटिंग बुलाकर आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने का ऐलान कर दिया.
लोकसभा चुनाव से पहले सीएम नीतीश कुमार के ये तीनों ही कदम बड़ा दांव माना जा रहा है. नीतीश कुमार ने अपने इस चाल से न केवल भारतीय जनता पार्टी को फंसाया है, बल्कि इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इंक्लूसिव अलायंस यानी इंडिया गठबंधन में अपना कद भी बढ़ा लिया है.
अब किसे मिलेगा कितना आरक्षण
बिल में जाति आधारित आरक्षण को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत कर दिया गया है. इसके अलावा, 10 फीसदी आरक्षण का लाभ उन लोगों को मिलेगा जो आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के हैं. नीतीश कैबिनेट के इस फैसले के बाद अब बिहार में आरक्षण लिमिट 75 फीसदी होने जा रही है.
किसे कितना आरक्षण मिलेगा
विधेयक का हवाला देते हुए बताया कि एसटी के लिए मौजूदा आरक्षण दोगुना कर किया जाएगा. वहीं एससी के लिए इसे 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत किया जाएगा.
अति पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण 18 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत तो ओबीसी के लिए आरक्षण को 12 फीसदी से बढ़ाकर 15 प्रतिशत किया जाएगा. बता दें कि शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में इन वर्गों के लोगों को इससे आरक्षण मिलेगा.
नीतीश ने दिया INDIA गठबंधन को बड़ा हथियार
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार नीतीश ने पिछले कुछ महीनों में जातिगत सर्वे और आरक्षण की सीमा 75 फीसदी बढ़ाने को लेकर पूरा समर्थन किया है क्योंकि अगड़ी जातियों का वोट कांग्रेस से खिसक गया है.
इस आरक्षण विधेयक से सुप्रीम कोर्ट की 50% वाली सीमा का क्या होगा?
बिहार में 50% से ज्यादा जातिगत आरक्षण देने वाले बिल के पास होने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के 1992 के फैसले की चर्चा होने लगी है.
दरअसल, सर्वोच्च अदालत ने 1992 के इंदिरा साहिनी फैसले में शिक्षा और रोजगार में मिलने वाले जातिगत आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा तय की थी. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या 50 प्रतिशत के बैरियर को राज्य सरकार तोड़ सकती है?
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता ने एबीपी से बातचीत करते हुए कहा कि- बिहार सरकार को आरक्षण की सीमा बढ़ाने का अधिकार है, लेकिन इस बारे में केन्द्र सरकार की सहमति के साथ सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करना भी जरूरी है. बिहार सरकार के फैसले को राज्यपाल की मंजूरी भी चाहिए होगी.
विराग गुप्ता आगे कहते हैं- आरक्षण का लाभ कितना मिला और क्रीमीलेयर के प्रावधानों को कैसे लागू किया जा इस बारे में सर्वेक्षण करने की जरुरत सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के बाद से बनी हुई है, लेकिन इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के कई निर्देशों के अनुसार केंद्र सरकार को समुचित कदम उठाने की जरूरत है.
पहले भी टूट चुका है 50 प्रतिशत का फॉर्मूला
सुप्रीम कोर्ट में बिहार सरकार के स्थाई वकील मनीष कुमार ने एबीपी को बताया कि- यह पहली बार नहीं है जब कोई राज्य इस 50 प्रतिशत के फॉर्मूले को तोड़ रही है. पहले भी कई सरकारों ने इसे तोड़ा है. सभी मामले अभी सुप्रीम कोर्ट में है.
उन्होंने आगे कहा कि जब कोर्ट का फैसला आएगा, तब हम भी आगे का फैसला ले लेंगे, लेकिन फिलहाल आरक्षण लागू करने को गलत नहीं कहा जा सकता है
