सरगुजा:- कहते हैं जिंदगी और मौत पर किसी का वश नहीं चलता. वश चलता है तो बस उस परम पिता परमेश्वर का. अपनों के गुजर जाने पर लोग गम के सागर में डूब जाते हैं. कई लोग तो डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. पर कुछ ऐसे बिरले भी होते हैं जो उस गम को जिंदगी का मरहम नहीं बल्कि दवा बनाकर अपनों के सपनों को पूरा करने निकल पड़ते हैं. सरगुजा के एक ऐसे ही शिक्षक हैं जो अपने मृत बेटे की याद में गार्डन बनाकर लोगों की सेवा कर रहे हैं.
बेटे की याद में बना दिया बच्चों के लिए गार्डन:
बेटे की याद में महान त्याग करने वाले शिक्षक का नाम संत कुमार है. संत कुमार बताते हैं कि उनके बेटे ईश्वर चंद विद्यासागर सिंह पैकरा की उम्र 21 साथ थी. उस वक्त बेटे ने पढ़ाई के लिए देवगढ़ की पहाड़ियों पर अकेले रहने का फैसला किया. संत कुमार कहते हैं कि उनका बेटा पढ़ाई के साथ साथ बागवानी भी किया करता. बेटे को प्रकृति से खास लगाव रहा. पेड़ पौधों में तो जैसे उसकी जान बसती. पढ़ाई के बाद जब भी मौका मिलता फूलों की क्यारियों को संवारने में जुट जाता.
पिता के संघर्ष से सच हुआ मृत बेते का सपना:
संत कुमार बताते हैं कि उनका बेटा पढ़ने में काफी होनहार था. अपने बेटे से वो आखिरी बार 26 जनवरी 2004 को मिले थे. 28 जनवरी को जब वो बेटे से मिलने गए तो उनका बेटा कमरे में बेसुध पड़ा मिला. संत कुमार ने बेटे को उठाने की भरसक कोशिश की लेकिन उनके बेटे का दम काफी पहले टूट चुका था. बेटे की मौत से संत कुमार पूरी तरह से टूट गए.
गम को बनाया जिंदगी जीने का मरहम:
संत कुमार बताते हैं कि बेटे की मौत के बाद वो पूरी तरह से बिखर गए. ऐसा लगा जैसे पूरी जिंदगी ही एक झटके में खत्म हो गई. कुछ दिनों तक संत कुमार गम में डूबे रहे. इसी बीच उनको ख्याल आया कि उनके गम में डूबे रहने से उनके बेटे की आत्मा दुखी होगी. क्यों न बेटे का सपना पूरा कर उसकी आत्मा को तृप्त किया जाए. फिर क्या था मृत बेटे की याद में शिक्षक संत कुमार ने अपनी कड़ी तपस्या शुरु की.
करोड़ों की जमीन बेटे के सपनों के लिए कुर्बान:
संत कुमार ने जिस तीन एकड़ की जमीन पर बगीचा आम लोगों के लिए बनाया है उसकी कीमत जरुर करोड़ों में होगी. पर बेटे के अनमोल सपने को पूरा करने के लिए शिक्षक संत कुमार ने अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया. एक सामान्य से शिक्षक ने बेटे की याद में जो अमूल्य कुर्बानी और त्याग दिखाया है वो अनमोल है. संत कुमार के लगाए बगीचे में कई किस्म के पेड़ पौधे हैं. बगीचे की हरियाली देखते ही बनती है.
पिता ने पेश की मिसाल:
सामाजिक रिश्तों का ताना बाना आज आज जिस तेजी से टूटता और बिखरता जा रहा है उस वक्त में पिता संत कुमार ने समाज के सामने एक बड़ी मिसाल पेश की है. आधुनिकता की दौड़ में जिस तरह से हम पर्यावरण को रौंदते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे हैं उस पर्यावरण की रक्षा का संदेश लेकर संत कुमार आगे बढ़ रहे हैं. संत कुमार सिर्फ एक मिसाल नहीं हैं. एक ऐसा पिता भी हैं जो बेटे के सपने के जरिए समाज कल्याण की दिशा में काम कर रहे हैं.
