जुलाई में SCO समिट होने वाली है. उम्मीद है चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग बैठक में हिस्सा लेने भारत आएंगे. लेकिन इससे पहले चीन ने अरुणाचल प्रदेश का नाम बदलकर फिर से तनाव वाली स्थिति पैदा की है. हालांकि इससे पहले भी वो ऐसा कर चुका है.अरुणाचल प्रदेश के कई जगहों के नाम चीन ने बदल दिए हैं. (ग्राफिक्स इमेज)चीन वो देश जो आदतन धोखेबाज है. बार-बार कुछ न कुछ ऐसा काम करता है जिससे तनाव की स्थिति बढ़ती जा रही है. पहले गलवान , फिर लद्दाख इसके बाद 9 दिसंबर 2022 अरुणाचल के तवांग (Tawang) में चीनी सेना की ओछी हरकतें.हर बार इसको बदले में जलालत ही मिली है
.अब चीन ने नई चाल चलते हुए अरुणाचल प्रदेश के 11 जगहों के नाम बदले हैं. मगर इसमें परेशानी वाली कोई बात नहीं ऐसा वो तीसरी बार कर रहा है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने चीन को इस मामले में लताड़ भी लगाई थी और कहा था इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता.चीन ने हर पड़ोसी देश परेशानचीन से केवल भारत नहीं बल्कि हर वो देश परेशान है जिससे सीमाएं इससे जुड़ी हुई हैं. इसकी नजर छोटे देशों पर कब्जा करने, बड़े देशों की सीमाओं पर घात लगाने पर लगी रहती है.
नेपाल, पाकिस्तान, भूटान इसका उदाहरण हैं. एशिया में वो भारत को वो अपना प्रतिद्वंदी मानता है. इसलिए वो उकसाता रहता है.बैठक में चीन नहीं पहुंचा थाचीन अरुणाचल को साउथ तिब्बत का एरिया मानता है. इसे वो जंगनान कहता है. खास बात ये है कि कुछ दिनों पहले ही जी-20 के प्रतिनिधियों की अरुणाचल प्रदेश में बैठक थी. चीन वहां नहीं गया था. इससे पहले साल 2021 और 2017 में भी चीन नाम बदलने वाली हरकतें कर चुका है. 2017 में अप्रैल का ही महीना था और तारीख थी 13. दलाई लामा नौ दिन की यात्रा के बाद अरुणाचल से चले गए थे.इससे पहले भी बदल चुका है नामइसके ठीक अगले दिन चीन ने छह जगहों के नाम बदल दिए थे. तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को चीन अलगाववादी कहता है.सीमा सुरक्षा कानून लागू होने के बाद भी ड्रैगन ने अरुणाचल के 15 स्थानों के नाम बदल दिए.
तब भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ तौर पर चीन को दो टूक जवाब देते हुए था कि इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. अरुणाचल हमारा अभिन्न अंग है और रहेगा. नाम बदलने से तथ्य नहीं बदल सकता.