नई दिल्ली :- वर्ल्ड होम्योपैथिक डे हर साल 10 अप्रैल को मनाया जाता है. इस दिन का मकसद होम्योपैथिक दिन के बारे में जागरूकता फैलाना है. होम्योपैथी का जनक जर्मन फिजिशियन, स्कॉलर सैमुअल हैनीमैन को माना जाता है. होम्योपैथी का जन्म जर्मनी में हुआ था. होम्योपैथी एक प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति है.
होम्योपैथी में सर्जरी का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. यह माना जाता है कि शरीर में बीमारियों को ठीक करने की क्षमता होती है और होम्योपैथी दवाएं इस क्षमता को उत्तेजित करने में मदद करती हैं. इसके अलावा होम्योपैथी में प्रत्येक रोगी को उसके व्यक्तिगत लक्षणों के आधार पर इलाज किया जाता है.
होम्योपैथी का जन्म जर्मनी में हुआ था. 18वीं शताब्दी में, डॉ. सैमुअल हैनीमैन ने इस चिकित्सा पद्धति को विकसित किया. डॉ. सैमुअल हैनिमैन का जन्म 10 अप्रैल 1755 को जर्मनी में हुआ था. उन्होंने 1796 में होम्योपैथी की खोज की. साल 1833 में, डॉ. सैमुअल ने जर्मनी में पहला होम्योपैथिक अस्पताल स्थापित किया था. इसके बाद साल 1948 में डॉ. एम.एल. भंडारी ने डॉ. हैनिमैन के जन्मदिन को विश्व होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाने की पहल की. होम्योपैथी दुनिया भर में लोकप्रिय हो रही है, क्योंकि यह एक सुरक्षित और प्रभावी चिकित्सकीय पद्धति है. इससे कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता है, जिनमें एलर्जी, अस्थमा, गठिया, त्वचा रोग और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं शामिल हैं.
वर्ल्ड होम्योपैथिक डे डॉ. हैनिमैन के योगदान को याद करने और उनके द्वारा स्थापित चिकित्सा पद्धति के बारे में जागरूकता फैलाने का अवसर प्रदान करता है. यह दिन होम्योपैथी चिकित्सकों के योगदान को स्वीकार करने और उन्हें सम्मानित करने का अवसर प्रदान करता है. यह दिवस लोगों को होम्योपैथी के बारे में जानकारी देने और इसके लाभों से अवगत कराने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
