बिहार। कैंडिडेट्स के लिए सबसे बड़ा सवाल है, सिपाही भर्ती परीक्षा का पेपर लीक कैसे हुआ? कैसे इतनी सटीक सेटिंग हुई? केंद्रीय चयन पर्षद के दावों में कितना दम था? ऐसे कई सवालों की पड़ताल के लिए हम मामले की जांच कर रही पुलिस टीम के साथ एग्जाम कंडक्ट कराने वाले एक्सपर्ट से मिले। हालांकि, वह कैमरे के सामने नहीं आए, लेकिन हमारे सभी सवालों का तर्क के साथ जवाब दिया।
पहला सवाल..पेपर कहां से लीक हुआ ?
पुलिस टीम और एक्सपर्ट का जवाब मैच करने वाला था। तर्क है कि अगर किसी एक सेंटर से पेपर लीक होता तो इतनी तेजी से सभी जिलों में नहीं फैलता। हर जिले में आंसर-की एग्जाम से लगभग दो घंटे पहले कैंडिडेट्स के हाथ में पहुंच गई थी। राज्य के 24 जिलों में 75 से अधिक एफआईआर और 150 से अधिक गिरफ्तारी इस बात के प्रमाण हैं।
जांच कर रहे अधिकारियों ने तो साफ कर दिया कि पेपर प्रिंटिंग प्रेस से ही लीक हुआ है। बिहार में परीक्षा को लेकर माफियाओं की जो तैयारी देखी गई, इससे एक बात साफ है कि डील मोटी रकम पर हुई। यह डील कितने में हुई थी, मुख्य आरोपी के पकड़े जाने पर ही पता चलेगा। इसमें केंद्रीय चयन पर्षद के जिम्मेदारों की संलिप्ता से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
दूसरा सवाल.. जब इतनी तैयारी थी तो राज खुला कैसे?
एक्सपर्ट बताते हैं कि लालच में पूरा खेल उजागर हो गया। बड़े माफिया ने पेपर की डील की। फिर बिहार के छोटे-छोटे नकल माफियाओं से उसने डील की। कैंडिडेट्स से पैसा वसूला गया। शुरुआत में 15 लाख रुपए की डील हुई, लेकिन कैंडिडेट्स के हाथ में जब आंसर-की आ गई तो वह खुद भी आंसर-की बेचकर पैसा निकालने लगे।
कंकड़बाग से गिरफ्तार सिपाही इसका साक्ष्य है। खेल ऐसा हुआ कि एग्जाम का टाइम नजदीक आते-आते सब्जियों की तरह दाम कम हो गए।
पुलिस की जांच में 35 हजार रुपए तक आंसर-की बेचे जाने के प्रमाण मिले हैं। इसके लिए बकायदा यूपीआई से ट्रांजेक्शन किया गया है। जांच टीम को एक महिला कैंडिडेट मिली, जिसने बताया कि सेंटर जाते समय रास्ते में 35 हजार में यूपीआई ट्रांजेक्शन से आंसर-की ली। पहले तो उसे विश्वास नहीं था, लेकिन सामने पेपर आया तो वह दंग रह गई। कैंडिडेट ने बताया लगभग सभी प्रश्नों का उत्तर आंसर-की में मौजूद था। एक्सपर्ट तो इस पूरे खेल में यूपी, हरियाणा और गुजरात का कनेक्शन बता रहे हैं।
तीसरा सवाल..नकल रोकने का दावा था तो पेपर लीक क्यों हुआ?
केंद्रीय चयन पर्षद के दावों को लेकर एक्सपर्ट और जांच टीम में शामिल पुलिस कर्मियों ने बताया, सिपाही भर्ती की इतनी बड़ी परीक्षा में नकल रोकने को लेकर कोई तैयारी नहीं की गई थी। सूत्र बताते हैं कि केंद्रीय चयन पर्षद की परीक्षा के पूर्व मेंबर्स के साथ कोई बैठक ही नहीं हुई थी।
चेयरमैन ही सारा काम देख रहे थे। कई जिलों में डीएम और एसपी की तरफ से भी परीक्षा को लेकर कोई बैठक नहीं की गई। बस औपचारिकता में बिहार बोर्ड की परीक्षा से भी कम तैयारी में एग्जाम का सेंटर तय कर परीक्षा करा ली गई। इसी कारण से एग्जाम शुरू होने के दो घंटे पहले तक ही एंट्री थी, लेकिन इस नियम का पालन सख्ती से नहीं कराया गया।
दो तरह से हुई डील
पुलिस सूत्र बताते हैं, नकल माफियाओं ने प्रिंटिंग प्रेस से मोटी रकम देकर डील की थी। इसके बाद कैंडिडेट्स से दो तरह की डील की गई। पहले 15 लाख तक की डीलिंग हुई, जिसमें पेपर के आंसर-की के साथ ब्लू टूथ और वॉकी टॉकी डिवाइस की सुविधा थी। कैंडिडेट्स को ब्लू टूथ की मक्खी डिवाइस दी गई। इसमें सेंटर के बाहर से पेपर सॉल्व कराने की पूरी व्यवस्था थी।
इसके साथ कम रेट की डीलिंग में कैंडिडेट्स को आंसर-की दी गई थी। कैंडिडेट्स को पेपर के दोनों सेट के आंसर-की दी गई थी। दोनों पेपर में सवाल एक थे, बस उनकी क्रम संख्या अलग थी। इसलिए सॉल्वर्स ने आंसर कोड के बजाए पूरा आंसर लिख रखा था। आंसर-की में हैंडराइटिंग अलग-अलग थी, इससे यह साफ है कि इसमें कई छोटे गिरोह भी शामिल हैं।
परीक्षा से ठीक पहले खुलासा, लापरवाही या मिलीभगत
सिपाही भर्ती परीक्षा में माफिया की खुफिया सेटिंग थी। उन्होंने आयोग और सेंटर की बजाए सीधा प्रिंटिंग प्रेस को ही सेट कर लिया था। यही कारण था कि पेपर हाथ में आने से पहले ही नकल का पूरा जाल बुन लिया गया। इलेक्ट्रॉनिक्स डिवाइस के साथ बिहार के 37 जिलों में नेटवर्क तैयार कर लिया गया।
