देहरादून:- भारत-पाकिस्तान के बीच इन दिनों हालात तनावपूर्ण हैं. पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने बदला लिया तो पाकिस्तान में हड़कंप मचा है. भारत की पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में ऑपरेशन सिंदूर के तहत आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई के बाद पाक बौखलाया हुआ है. पाक एलओसी पर लगातार फायरिंग कर रहा है. जिसमें कई आम नागरिकों की जानें गई हैं. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र में रहने वाले गुरिल्लाओं की चर्चा होने लगी है, जो युद्ध की विशेष पद्धति का प्रशिक्षण लिए हुए हैं और युद्ध के दौरान सेवा के लिए काफी अहम भूमिका निभा सकते हैं.
जम्मू कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड समेत पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, नगालैंड, मिजोरम और असम जैसे राज्यों में ऐसे प्रशिक्षित योद्धा मौजूद हैं, जिन्होंने चीन के साथ 1962 की जंग के बाद विशेष प्रशिक्षण के जरिए खुद को युद्ध के हालातों के लिए पारंगत किया. आज उनकी बात इसलिए हो रही है क्योंकि, एक बार फिर देश युद्ध जैसे हालातों के बीच खड़ा है. बस फर्क इतना है कि इस बार तनाव चीन के साथ नहीं बल्कि, चिर परिचित दुश्मन पाकिस्तान के साथ दिखाई दे रहा है.
सेना की मदद के लिए ‘गुरिल्लाओं’ को दिया गया प्रशिक्षण: दरअसल, युद्ध की स्थिति को देखते हुए उस दौरान एसएसबी यानी सशस्त्र सीमा बल (SSB) का गठन किया गया था. इसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रहने वाले तमाम युवा, महिलाओं और बुजुर्गों को भी युद्ध के हालातों की जानकारी देते हुए प्रशिक्षण दिया गया था.
उस दौरान इन्हें ‘गुरिल्ला’ का नाम दिया गया, जो युद्ध की स्थिति में सेना की कई तरह से मदद करने के लिए प्रशिक्षित थे. इतना ही नहीं दुश्मन देश की सेना को भी चकमा देकर उनकी गोपनीय सूचना अपनी सेना तक पहुंचा सकते थे. इस तरह से गुरिल्ला सेना का अहम अंग बन चुके थे.
कई देश इस्तेमाल कर चुके गुरिल्ला वार: गुरिल्ला जो न केवल देश की सेना को कई तरह से मदद करने के लिए प्रशिक्षित किए गए बल्कि, जरूरत पड़ने पर छापामार युद्ध लड़ने के लिए भी सक्षम थे. गुरिल्ला वार एक तरह की युद्ध पद्धति है, जिसका पूर्व में कई देशों ने इस्तेमाल भी किया है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण अमेरिका और वियतनाम की लड़ाई का है, जहां अमेरिका जैसे ताकतवर देश ने घुटने टेक दिए.
साल 1967 के दौरान अमेरिका, वियतनाम में घुसकर उसे जीतने का प्रयास करता दिखाई दिया. लेकिन साल 1973 में अमेरिकी सैनिकों को मजबूरन वापस लौटना पड़ा. अमेरिका की हार के पीछे वैसे तो एक नहीं बल्कि, कई कारण माने गए, लेकिन इनमें से एक कारण वियतनामी गुरिल्ला भी थे, जो स्थानीय हालातों को जानते थे और छापामार युद्ध पद्धति में पारंगत थे.
सरकारी तंत्र में जुड़ने के लिए गुरिल्ला कर रहे आंदोलन: भारत में 1962 की जंग के बाद तैयार किए गए गुरिल्ला स्थानीय लोग थे और सीमावर्ती क्षेत्र की अच्छी जानकारी रखने वाले थे. हालांकि, साल 2002 में केंद्र सरकार ने इनसे आधिकारिक जुड़ाव खत्म कर दिया. जिसके बाद से ही कई राज्यों में इन गुरिल्लाओं ने खुद को सरकारी तंत्र में जुड़ने के लिए आंदोलन भी किया.
नौकरी और पेंशन की मांग कर रहे गुरिल्ला: गुरिल्लाओं की तरफ से नौकरी और पेंशन की भी मांग की गई. उत्तराखंड में भी फिलहाल यह प्रकरण लंबित है. हालांकि, हाईकोर्ट ने गुरिल्लाओं के पक्ष में सरकार को फैसला लेने का आदेश दिया. उधर, मणिपुर में इन गुरिल्लाओं को सरकारी तंत्र से जोड़ने का काम किया गया.
“उत्तराखंड समेत कई राज्यों में गुरिल्ला (गोरिल्ला) फोर्स को शांति और युद्ध काल दोनों के लिए ही तैयार किया गया था. इनका काम था कि ये युद्ध के दौरान सेना को जरूरत का सामान उन तक पहुंचाने, दुश्मन देश की सेना को लेकर अंतरराष्ट्रीय सीमा पर मिलने वाली गोपनीय सूचनाओं को पहुंचाने और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों की जानकारी देना था. उधर, युद्ध क्षेत्र या अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भारतीय सेना के लिए पैदल मार्ग बनाना और इसकी सेना को जानकारी देना जैसे काम भी प्रशिक्षण के दौरान बताए गए थे.” – लक्ष्मण रावत, प्रशिक्षित गुरिल्ला, उत्तराखंड
भारत पाकिस्तान तनाव के बीच सीमावर्ती क्षेत्रों में गुरिल्ला निभा सकते अहम भूमिका: भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ रहे तनाव के बीच सीमावर्ती क्षेत्रों में गुरिल्लाओं की भूमिका काफी अहम हो सकती है. ये बात एक्सपर्ट भी मानते हैं. भारतीय सेना में कई सालों तक अपनी सेवा देने वाले रिटायर्ड कर्नल राकेश राणा कहते हैं कि सैन्य मदद में इनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है.
“सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग न केवल स्थानीय भौगोलिक स्थितियों को बारीकी से जानते हैं बल्कि, अंतरराष्ट्रीय सीमा पार के लोगों की भाषा उनके तौर तरीकों को पहचानते हैं. ऐसे में युद्ध के दौरान इन गुरिल्लाओं का बेहद खास रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.” – रिटायर्ड कर्नल राकेश राणा
भारत और पाकिस्तान जिस तरह युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं, उसके बाद भारतीय सेना युद्ध की विशेष पद्धति को जानने वाले गुरिल्ला बॉर्डर पर अहम रोल अदा कर सकते हैं. यह तब और भी अहम हो जाता है, जब भारत की मिसाइल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान भी रीटेलिएट करता है और स्थिति युद्ध की बन आती है. जाहिर है कि इन्हीं खासियत के कारण प्रशिक्षित गुरिल्ला चर्चाओं में हैं और मौजूदा हालातों में अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र में यह सेना की विशेष रूप से मदद कर सकते हैं.
उत्तराखंड में दो जगह बनाए गए थे प्रशिक्षण केंद्र: उत्तराखंड में दो जगह पर प्रशिक्षण केंद्र उस दौरान बनाए गए थे. जिसमें महिलाओं के लिए खास कर पौड़ी जिले में गुरिल्ला प्रशिक्षण केंद्र बनाया गया था. इसके अलावा चमोली जिले के ग्वालदम में प्रशिक्षण केंद्र था, जिसमें महिला और पुरुष दोनों ही प्रशिक्षण ले सकते थे.
उत्तराखंड में प्रशिक्षण लेने के लिए असम, जम्मू कश्मीर और मणिपुर तक के लोग भी उस दौरान आया करते थे. उन्होंने यहां पर प्रशिक्षण लिया था. हालांकि, उत्तराखंड के भी कुछ लोगों ने हिमाचल के प्रशिक्षण केंद्र में भी जाकर प्रशिक्षण लिया था.
उत्तराखंड में करीब 25,000 गुरिल्ला: साल 2013 में भारत सरकार की ओर से एसएसबी प्रशिक्षित गुरिल्लाओं का सत्यापन किया गया था. उस दौरान करीब 25,000 गुरिल्ला उत्तराखंड में पाए गए थे. चमोली और पिथौरागढ़ में सबसे ज्यादा प्रशिक्षित गुरिल्ला मौजूद हैं. इन दोनों ही जिलों में करीब 5-5 हजार गुरिल्ला हैं. इसके अलावा उत्तरकाशी जिले में भी करीब 3 हजार गुरिल्ला मौजूद हैं.
हालांकि, सीमावर्ती जिलों के अलावा बाकी जिलों में भी लोगों को इसके लिए प्रशिक्षित किया गया था. इसमें देहरादून के चकराता, कालसी क्षेत्र के करीब 1500 लोगों को प्रशिक्षित किया गया. इसी तरह रुद्रप्रयाग में भी करीब 800 गुरिल्ला प्रशिक्षित किए गए थे.
पौड़ी जिले में 900 लोगों को यह प्रशिक्षण दिया गया. जबकि, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चंपावत जिले में भी करीब 1500-1500 लोगों को गुरिल्ला प्रशिक्षण दिया गया. टिहरी जिले में करीब 1100 लोगों ने प्रशिक्षण लिया था. इस तरह से देखा जाए तो सीमावर्ती जिलों के साथ अन्य जिलों से लोगों को प्रशिक्षित किया गया था.
प्रशिक्षित गुरिल्लाओं में करीब 15 फीसदी महिलाएं भी शामिल: प्रशिक्षण केंद्रों से प्रशिक्षित गुरिल्लाओं में करीब 15 फीसदी महिलाएं भी थीं. जिन्होंने युद्ध के हालातों में सेना की मदद को लेकर विशेष पद्धति वाले इस प्रशिक्षण को पाया था. इनमें से कई गुरिल्ला अब इन जिलों से पलायन कर उधम सिंह नगर या हरिद्वार भी रह रहे हैं या देहरादून में भी समय के साथ उन्होंने अपना निवास स्थान बदला है.
गुरिल्ला संगठन की तीन प्रमुख मांगें-
एसएसबी प्रशिक्षित गुरिल्लाओं को स्थायी नियुक्ति यानी सरकारी नौकरियां दी जाएं
सभी गुरिल्ला प्रशिक्षित लोगों के लिए पेंशन की भी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए
गुरिल्लाओं की अन्य लंबित समस्याओं का समाधान भी किया जाए
सीएम धामी सुन चुके समस्या: सशस्त्र सीमा बल से प्रशिक्षित गुरिल्ला स्वयंसेवकों की समस्याओं के निस्तारण को लेकर सीएम धामी बैठक भी कर चुके हैं. साल 2023 में 20 दिसंबर को भी एक अहम बैठक हुई थी, जिसमें तमाम जिलों से गुरिल्ला स्वयंसेवक वर्चुअल रूप से जुड़े. बैठक के दौरान सीएम धामी ने गुरिल्ला प्रशिक्षकों की समस्याओं को भी सुना था.
उस दौरान सीएम धामी ने अधिकारियों को तमाम विभागों में प्रशिक्षित गुरिल्ला स्वयंसेवकों को आजीविका से जोड़ने के लिए प्रयास करने के निर्देश दिए थे. इसके अलावा गुरिल्लाओं की जिन समस्याओं का तत्काल समाधान हो सकता है, उसे दूर किया जाए. सीएम धामी ने कहा था कि गुरिल्लाओं की मदद के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भी भेजा जाएगा.
उन्होंने गुरिल्ला प्रशिक्षकों का लाभ वाइब्रेंट विलेज योजना, होमगार्ड में प्रशिक्षक, निजी सुरक्षा एजेंसियों में सुरक्षा कर्मी, फॉरेस्ट फायर वाचर, पुलिस विभाग के तहत ग्राम चौकीदार, लोक निर्माण विभाग में तमाम कार्यों, वन विभाग की तमाम योजनाओं और अन्य क्षेत्रों में कैसे लिया जा सकता है? इस पर भी ध्यान देने को कहा था.