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    कैसे बनते हैं एस्टेरॉइड, कहां से आते हैं और किस तरह बन जाते हैं धरती के लिए खतरा, जानें…

    By Tv 36 HindustanSeptember 22, 2024No Comments5 Mins Read
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    एस्टेरॉयड धीरे-धीरे अब धरती के लिए खतरा बनता जा रहा हैं. कहा जाता है कि अगर धरती से एस्टेरॉयड टकरा जाए, तो पूरी दुनिया में तबाही मच जाएगी. हाल ही में एक जानकारी सामने आई है कि एपोफिस नाम का एस्टेरॉयड धरती की ओर बढ़ रहा है. इसको लेकर नासा ने चेतावनी भी जारी कर दी है. ऐसे में एक सवाल उठता है, कि ये एस्टेरॉयड कहां से आते हैं और कैसे ये धरती के लिए खतरा बन जाते हैं?जब भी हम स्पेस के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले हमें सोलर सिस्टम याद आता है, जिसमें सूरज के चारों ओर चक्कर लगाते हुए नौ प्लैनट्स दिखते हैं. लेकिन चारो ओर सिर्फ प्लैनट्स ही नहीं, बल्कि इसके साथ ही भी कई प्लैनट्स और उनके टुकड़े भी चारो ओर घूमते रहते हैं. यही टुकड़े एक तरह से सोलर सिस्टम का बचा हुआ मलबा है.

    कैसे बनें एस्टेरॉयडकरीब साढ़े चार अरब साल पहले, सोलर सिस्टम में गैस और धूल के एक घूमते हुए बादल से ज्यादा कुछ और नहीं था. जब वह बादल ढह गया तो माना जाता है कि किसी विस्फोटित तारे से आने वाली शॉकवेव के कारण उसके बड़े कई बड़े टुकड़े हो गए. इसके बाद प्लैनट्स के ग्रेविटेशनल फोर्स ने आस-पास के टुकड़ों को अपनी ओर खींच लिया.मलबे के बादल का 99 परसेंट एक बड़े परमाणु रिएक्टर का हिस्सा बन गया. बाकी के एक प्रतिशत ऑरबिट्स के चक्कर लगाने लगे. लेकिन चक्कर लगाने वाले सभी टुकड़े इतने बड़े नहीं थे कि उन्हें प्लैनट्स का दर्जा दिया जा सके. इसलिए कुछ बाकी के छोटे टुकड़ों को एस्टेरॉयड कहा गया.

    नासा के मुताबिक एस्टेरॉयड सूरज की परिक्रमा करने वाला एक चट्टानी पत्थर है. वो सोलर सिस्टम के लिहाज से छोटा है, लेकिन धरती के लिए वो काफी बड़े हैं. ये प्लैनट्स के चारो ओर घूमते रहते हैं. मलबे के बादल का 99 परसेंट एक बड़े परमाणु रिएक्टर का हिस्सा बन गया. वो बड़े टुकड़े या मलबा तब से ही प्लैनट्स और सूरज के चारो ओर घूमते रहते हैं. कहा जाता है कि ये पूरी घटना इतनी तेज हुई थी कि हाइड्रोजन एटम हीलियम में मिल गए थे. ये हुई एस्टेरॉयड के बनने की बात.

    अब जानेंगे ये एस्टेरॉयड कैसे धरती के लिए खतरा बनते जा रहे है.।एस्टेरॉयड क्यों बनें धरती के लिए खतरापिछले कई सालों से एस्टेरॉयड को लेकर लगातार कोई न कोई ऐसी खबर आती है कि ये धरती से टकरा सकते हैं, ऐसे में ये धीरे-धीरे धरती पर जीवन के लिए खतरा बढ़ता जाता है, क्योंकि इनका आकार किसी ईंट या पत्थर इतना नहीं बल्कि एक से दो राज्य के बराबर होता है, इसस ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये एस्टेरॉयड धरती के लिए क्यों इतना बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं.एस्टेरॉयड भले ही धरती के लिए खतरा हो, लेकिन धरती पर रहने वाले मानव जीवन ने इतनी तरक्की कर ली है कि वो किसी एस्टेरॉयड से भी टक्कर ले सकते हैं. इसको लेकर भी नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन यानी नासा के पास धरती को एस्टेरॉयड्स और कॉमेट से बचाने की योजना तैयार है.

    नासा ने पिछले कुछ महीने में एक नई प्लैनेटरी डिफेंस स्ट्रैटेजी एंड एक्शन प्लान बनाया था. इसको लेकर प्लैनेटरी डिफेंस ऑफिसर लिंडले जॉनसन ने कहा कि धरती पर एस्टेरॉयड की तबाही से बचने के लिए नासा के पास पूरी तरह से रोकने के लिए पर्याप्त तकनीक है. उन्होंने आगे कहा कि नासा की इस रणनीति से अगले 10 सालों के लिए नासा के इरादे मजबूत हो गए हैं. नासा ने प्लैनेटरी डिफेंस स्ट्रैटेजी एंड एक्शन प्लान पिछले साल 18 अप्रैल को जारी किया था.

    क्या है दुनिया के सबसे बड़े एस्टेरॉयड का नामनासा की नई गणना के अनुसार सूरज के चारों ओर दस लाख से ज्यादा एस्टेरॉयड हैं. कई 10 मीटर से भी कम डॉयमीटर के हैं. हालांकि, कुछ एस्टेरॉयड बहुत बड़े भी हैं. आकलन किया जाए तो सबसे बड़ा एस्टेरॉयड कैलिफोर्निया देश के क्षेत्रफल से लगभग दोगुना का है. सेरेस पहले सबसे बड़ा एस्टेरॉयड था. इसका डॉयमीटर चंद्रमा के लगभग एक तिहाई का है, लेकिन 2006 में इसे एक डार्फ प्लैनट्स के रूप में माना जाने लगा.ज्यादातर एस्टेरॉयड एक मुख्य एस्टेरॉयड की बेल्ट में पाए जाते हैं, ये मार्स और जुपिटर के बीच सूरज के चारो ओर घूमता हैं. हालांकि ये हमेशा एक नियमित ऑरबिट में नहीं रहते हैं. कभी जुपिटर के काफी ग्रेविटेशनल फोर्स के प्रभाव के कारण हमेशा मौजूदा संभावना के साथ, कभी-कभी ये एस्टेरॉयड को ऑरबिट के बाहर निकल जाते हैं.कभी-कभी ये एस्टेरॉयड कुछ प्लैनट्स से भी टकरा जाते हैं. कई बार ये धरती से भी टकराए हैं

    . माना जाता है जब अभी तक सबसे खतरनाक एक एस्टेरॉयड युकाटन नाम के एक प्रायद्वीप में टकराया. इससे ऐसी तबाही हुई, जिससे डायनासोर और जानवर खत्म हो गए. कहा जाता है कि इसके साथ ही यहां तीन-चौथाई प्रजातियां भी खत्म हो गईं.

    क्यों मनाया जाता है विश्व एस्टेरॉयड दिवससाइबेरिया में एक तुंगुस्का नाम की नदी है. इसमें करीब 30 जून, 1908 में एक बहुत ही बड़ा विस्फोट हुआ था. इसे तुंगुस्का प्रभाव कहा जाने लगा. रिपोर्ट्स की मानें तो ये एस्टेरॉयड इतना खतरनाक था कि इससे लगभग दो हजार किमी के क्षेत्र में फैले 80 मिलियन पेड़-पौझे तबाह हो गए थे.

    इस साइबेरिया में तुंगुस्का नदी के आसपास हुई इस घटना की याद में ही हर साल 30 जून को विश्व एस्टेरॉयड दिवस मनाया जाता है. इसके जरिए एस्टेरॉयड से होने वाले खतरों के बारे में लोगों को जानकारी देकर उनकी जागरूरकता बढ़ाने कोशिश की जाती है.कैसे हुई एस्टेरॉयड की खोजएस्टेरॉयड की खोज सबसे पहले 1801 में एस्ट्रोनॉमर गुइसेप पियाजी ने की थी. ये अब तक का खोजा गया सबसे बड़ा एस्टॉरायड बताया जाता है. कई लोग एस्टेरॉयड को उल्का पिंड भी कहते हैं हालांकि ऐसा नहीं है. एस्टेरॉयड सूरज का चक्कर लगाने के बाद धरती पर गिरने के बावजूद बच जाते हैं. वहीं उल्का पिंड पृथ्वी से टकराने से पहले ही जल जाते हैं.

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