नई दिल्ली:– उल्लू की आंखें रात में बेहतर देख पाने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन की गई हैं, जिससे उसे दिन की तेज़ रोशनी में ठीक से देखाई नहीं देता. यही कारण है कि वह दिन में कम ही सक्रिय रहता है और रात में शिकार करता है.
उल्लू की आंखों में “रॉड सेल्स” की संख्या बहुत अधिक होती है, जो कम रोशनी में उत्कृष्ट रूप से काम करती हैं. यह उसे रात के अंधेरे में शिकार ढूंढने में मदद करता है, जबकि इंसानों की आंखों में ये सेल्स कम होते हैं.
कोन सेल्स” की संख्या उल्लू की आंखों में कम होती है, जो दिन के समय में रंगों और तेज रोशनी को पहचानने में मदद करते हैं. इसके कारण उल्लू दिन के समय में दृश्यता के मामले में अन्य पक्षियों की तुलना में कमजोर होता है.
उल्लू की आंखों में एक विशेष परत होती है, जिसे “टेपेटम ल्यूसिडम” कहते हैं. यह परत उल्लू की आंखों के अंदर की रोशनी को पुनः परावर्तित करती है, जिससे उसकी रात की दृष्टि और भी तेज़ हो जाती है. यह परत उल्लू को अंधेरे में भी स्पष्ट रूप से देखने में मदद करती है.
उल्लू की आंखें उसके सिर की हड्डियों में स्थिर रहती हैं, और ये घुमती नहीं हैं. हालांकि, उल्लू का सिर 270 डिग्री तक घूम सकता है, जो उसे चारों ओर के परिवेश को देखने में सक्षम बनाता है. लेकिन तेज़ रोशनी के कारण इसका फायदा कम हो जाता है.
उल्लू एक निशाचर पक्षी है, जिसका मतलब है कि वह रात के समय में सक्रिय रहता है और दिन में सोता है. रात में उसकी दृष्टि और सुनने की शक्ति उसे शिकार करने में मदद करती है. वह बहुत शांत तरीके से शिकार करता है और उसकी आंखों और कानों की मदद से शिकार को आसानी से पकड़ लेता है.
उल्लू की सुनने की शक्ति इतनी तेज होती है कि वह घास या पेड़ों के नीचे छिपे हुए शिकार को भी पहचान सकता है. इसकी विशेषता यह है कि उल्लू का कानों का आकार और स्थान उसके शिकार की दिशा को पहचानने में मदद करता है, जिससे वह बिना देखे भी शिकार का स्थान जान लेता है.
