डिब्रूगढ़:- असम के डिब्रूगढ़ के खोवांग अथाबारी का एक परिवार ऐसा है जिन्होंने जरूरतमंदों की सेवा के लिए अपना पुश्तैनी मकान को स्थायी आश्रय के तौर पर दान कर दिया है. इस मकान को दिव्यांग लोगों के साथ-साथ व्यवसायिक केंद्र के तौर पर काम करने वालों के लिए भी दान किया गया है.
अब आप जानना चाहेंगे कि, इस परिवार ने आखिर ऐसा क्यों किया. अतीत को टटोलेंगे तो पता चलेगा कि, इस दान के पीछ एक गहरी व्यक्तिगत भावना जुड़ी हुई है. दिवंगत सैलेन सैकिया और जोनारानी सैकिया अपने खोवांग अथाबारी घर में एक शांत जीवन जी रहे थे. यहां उन्होंने दो बच्चों की परवरिश की. हालांकि, दोनों ही शारीरिक चुनौतियों के साथ पैदा हुए थे. माता-पिता के निधन के बाद, उनके बच्चों के पास तत्काल देखभाल करने वाला कोई नहीं था.
जब परिवार के भीतर उन्हें किसी संस्थान में भर्ती कराने के बारे में चर्चा शुरू हुई, तो एक बात स्पष्ट रूप से साफ हो गई, भाई-बहन अपना घर नहीं छोड़ना चाहते थे. बच्चों के भावनात्मक जुड़ाव को ध्यान में रखते हुए, परिवार ने इसे एक आश्रय में बदलने का फैसला किया, जहां उनकी देखभाल की जा सके और साथ ही अन्य दिव्यांग लोगों को भी रखा जा सके. ऐसा सोचकर उन्होंने पूरा घर दान कर दिया.
एनजीओ प्रेरणा प्रतिबंधी के सहयोग से, घर को ‘जीवन जोना दिव्यांग पुनर संस्थापन अरु उत्पादन प्रतिष्ठान’ में बदल दिया गया. यह असम का पहला निःशुल्क पुनर्वास और उत्पादन केंद्र है, जो विशेष रूप से दिव्यांग व्यक्तियों के लिए है.
यह केंद्र 18 साल से अधिक आयु के उन व्यक्तियों के लिए है, जिन्हें शारीरिक चुनौतियां हैं. इनमें से कई लोगों को समाज द्वारा त्याग दिया जाता है, अनदेखा किया जाता है या दरकिनार कर दिया जाता है. कुछ को उनके अपने परिवारों द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता है. इस केंद्र में, निःशुल्क भोजन, आश्रय, चिकित्सा देखभाल, भावनात्मक समर्थन और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है. लेकिन किसी भी चीज से बढ़कर, घर एक ऐसी जगह है जहां उन्हें लगता है कि मनुष्य के रूप में उनका सम्मान किया जाता है.
एनजीओ प्रेरणा प्रतिबंधी के एक प्रतिनिधि ने कहा कि, लोगों की धारणा है कि दिव्यांगों को सहानुभूति और दान की आवश्यकता होती है. लेकिन यह गलत है. दरअसल उन्हें सम्मान, स्वतंत्रता और अवसर की आवश्यकता है. और केंद्र उन्हें ये सब प्रदान करता है.
केंद्र में, सबसे पहले ध्यान आकर्षित करने वाली व्यक्ति धेमाजी जिले की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री ब्यूटी गोगोई हैं. बचपन से ही व्हीलचेयर तक सीमित रहने वाली ब्यूटी को उनके अपने परिवार ने अकेला छोड़ दिया था. उन्हें अपने जीवन के चुनौतीपूर्ण साल बिना किसी सहारे के बिताने पड़े. लेकिन 2019 की असमिया फिल्म राइजिंग सन में अभिनय करने के बाद वह फेमस हो गईं.
इस प्रदर्शन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार दिलाया. ब्यूटी ने कहा कि, उन्हें दिल्ली में पुरस्कार मिला लेकिन गुवाहाटी में पूर्व मंत्री प्रमिला रानी ब्रह्मा ने आधिकारिक तौर पर उन्हें यह पुरस्कार दिया. उसके बाद से वह हाशिये पर चली गईं. अब वह केंद्र में ही रहती है. ब्यूटी परिसर में ‘दिव्यांग दुकान’ नाम से एक छोटी सी जनरल स्टोर चलाती है, जहां वह घरेलू और जरूरी सामान बेचती है.
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं व्हील चेयर पर हूं, लेकिन जैसे मैं बाकी सभी काम करती हूं वैसे ही मैं अपना खुद का व्यवसाय चला सकती हूं. मैं चाहतींहूँ कि मुझे चाहा जाए. मैं खुश हूं कि मैं आजीविका कमा रही हूं.”
जीवन जोना केंद्र में चार दिव्यांग और हैं. लेकिन योजनाएं विस्तार करने और जरूरतमंद लोगों को घर में लाने की है. घर का प्रबंधन करने वाले एनजीओ ने जरूरतमंद लोगों के लिए दरवाजे खोल दिए हैं. उन्हें बस प्रेरणा प्रतिबंधी से संपर्क करना है और सत्यापन के बाद, बिना किसी खर्च के वहां रहना है.
किसी भी सरकारी फंडिंग के बिना, केंद्र केवल सामुदायिक दान, स्वयंसेवी प्रयासों और इसमें शामिल लोगों के दृढ़ संकल्प के आधार पर चलता है. स्थानीय लोग भोजन, दवा और बुनियादी ढांचा सहायता प्रदान करने के लिए आगे आते हैं.
परिवार के एक सदस्य ने कहा, “यह लोगों की परियोजना है जिसे समुदाय द्वारा संचालित किया जाना चाहिए. हम यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि हमारे माता-पिता की मृत्यु के बाद हमारा घर खंडहर में न बदल जाए. इसके बजाय, यह एक ऐसी जगह बन गई है जहां जीवन का पुनर्निर्माण हो रहा है.