कोबे:- कॉर्बन डाई ऑक्साइड के अपने जीरो इमीशन विकिरण के लक्ष्य की राह पर चलकर जापान हाइड्रोजन ईंधन के क्षेत्र में दुनिया में अव्वल बनना चाहता है. लेकिन इस महत्वाकांक्षा के लिए उसकी एक बड़ी परियोजना बाधक बन गई है. जलवायु को लेकर जापान की ये परियोजना अधर में लटक गई है. हाइड्रोजन ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला (HESC) के तहत ऑस्ट्रेलिया से जापान तक तरल हाइड्रोजन भेजने के लिए बड़े प्रयास किए जा रहे हैं.
हालांकि, ऑस्ट्रेलिया में इस परियोजना के बारे में अनिश्चितता को लेकर HESC अपने डिमांस्ट्रेशन फेज के लिए साल 2030 की समय सीमा को पूरा करने के लिए जापान से ही हाइड्रोजन का स्रोत बनाएगा.
कागज़ों पर हाइड्रोजन ऊर्जा को लेकर आशाएं बढ़ी हैं. जीवाश्म ईंधन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं, जबकि हाइड्रोजन को जलाने से केवल जल वाष्प बनता है. ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से धरती के ताप में बढ़ोतरी होती है. अभी तक दुनिया को ऊर्जा को लेकर आशातीत सफलता नहीं मिली है. वैश्विक स्तर पर कई बहुप्रचारित परियोजनाएँ उच्च लागत और इंजीनियरिंग चुनौतियों से निपटने में लगी हैं.
वहीं हाइड्रोजन की जलवायु संबंधी दिक्कतें भी हैं, इस वजह से भी उत्पादन पर असर पड़ सकता है.
गौर करें तो ग्रीन हाइड्रोजन के तहत अक्षय ऊर्जा का उपयोग होता है, जबकि “ब्लू हाइड्रोजन” उत्सर्जन को कम करने के लिए कार्बन-कैप्चर तकनीक के साथ जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता रहती है. ब्लू हाइड्रोजन में कोयला और गैस का उपयोग किया जाता है. वहीं ब्राउन हाइड्रोजन बिना किसी कार्बन कैप्चर के जीवाश्म ईंधन द्वारा उत्पादित किया जाता है.
एचईएससी परियोजना के तहत आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य के लिग्नाइट कोयले को उपयोग में लाकर ब्लू हाइड्रोजन का उत्पादन करना है.
जापान की ये महात्वाकांक्षी परियोजना जापान के कोबे के पास ही स्थित है. दुनिया के पहले लिक्विड हाइड्रोजन टैंकर और भंडारण को लेकर HESC प्रोजेक्ट को हाई प्रोफाइल रूप में प्रसारित किया जा रहा है.
HESC का कहना है कि इसका लक्ष्य हाइड्रोजन का भरपूर मात्रा में उत्पादन करना है. हाइड्रोजन उत्पादन के जरिए हरेक साल वायुमंडल में जारी होने वाले 1.8 मिलियन टन कॉर्बन डाई ऑक्साइड को कम किया जा सके.
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़े बताते हैं कि जापान के ऊर्जा क्षेत्र ने साल 2022 में ईंधन दहन से 974 मिलियन टन CO2 उत्सर्जित किया है.
HESC को लेकर कड़ा विरोध
जापान सरकार ने HESC के वर्तमान “व्यावसायिक प्रदर्शन” फेज के लिए 220 बिलियन येन यानी 1.4 बिलियन डॉलर देने का वादा किया है. इसकी समाप्ति की अवधि वर्ष 2030 है. इस समय सीमा को पूरा करने के लिए, HESC परियोजना अब जापान में ही हाइड्रोजन का स्रोत बनाएगी. इस परियोजना के लिए ऑस्ट्रेलिया की बजाय जापान में हाइड्रोजन का स्रोत बनाने को मजबूर होने के लिए ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया गया है. इन अधिकारियों ने इस परियोजना के पर्यावरणीय पहलू को लेकर चिंता जताई है.
HESC से जुड़ी कंपनियों में से एक, जापान की कावासाकी हेवी इंडस्ट्रीज के प्रवक्ता ने कहा कि प्रोडक्शन को जापान में स्थानांतरित करने का निर्णय ऑस्ट्रेलियाई पक्ष की हीलाहवाली की वजह से हुआ है.
इसको लेकर पूछे गए सवालों पर ऑस्ट्रेलिया की विक्टोरिया सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया. वहीं ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने स्थानीय मीडिया को बताया है कि यह कदम विशु्दध रूप से एक जापान का “व्यावसायिक निर्णय” था.
टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ इंफॉर्मेशन साइंसेज के डेसुके अकीमोटो ने कहा कि परियोजना में ऑस्ट्रेलिया की रुचि कम होने का कारण पर्यावरण कार्यकर्ताओं और ऊर्जा विशेषज्ञों का विरोध है. ये लोग पहले से ही कार्बन कैप्चर और स्टोरेज का विरोध करते रहे हैं.