
बस्तर। चैत्र नवरात्र की शुरुआत आज से हो गयी है। पूरे देश में नवरात्र की धूम दिखाई दे रही है। इसी के साथ छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी चैत्र नवरात्रि बड़े उत्साह से मनाया जा रहा है।
संभाग के सभी जिलों के देवी मंदिरों में सुबह से ही दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगा हुआ है। वहीं, 52 शक्तिपीठों में से एक दंतेवाड़ा जिले में स्थित माता दंतेश्वरी के मंदिर में आज चैत्र नवरात्रि के मौके पर विशेष पूजा अर्चना की गई है। कोरोना काल के खत्म होने के बाद 2 साल में पहली बार मंदिर में सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओ की भीड़ दिखी। नवरात्रि के मौके पर कुल 5051 मनोकामना दीप श्रद्धालुओं की तरफ से जलाए गए हैं, इसके अलावा बस्तर जिले के जगदलपुर शहर में स्थित दंतेश्वरी मंदिर (Danteshwari Temple) में भी श्रद्धालुओं की लाइन लगी हुई है।दंतेश्वरी माता को बस्तर की आराध्य देवी कहा जाता है, यही वजह है कि चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान सिर्फ बस्तर संभाग से नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य तेलंगाना, महाराष्ट्र ,उड़ीसा से भी बड़ी संख्या में यहां श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
माता का गिरा था दांत दंतेवाड़ा में स्थित दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी ने बताया कि ये मंदिर सैकड़ों साल पुराना है और रियासत काल से इस मंदिर का काफी महत्व है। ऐसी भी मान्यता है कि माता सति का एक दांत दंतेवाड़ा में गिरा था, इसलिए इस जगह का नाम दंतेवाड़ा हुआ और इस मंदिर को दंतेश्वरी मंदिर के नाम से जाना जाता है।ये मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है, शारदीय नवरात्रि के दौरान हजारों की संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। वहीं, चैत्र नवरात्रि के मौके पर भी इस साल सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।
दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास वारंगल राज्य के राजा अन्नम देव ने चौधरी शताब्दी में दंतेश्वरी मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर को 52वाँ शक्ति पीठ माना जाता है। इस मंदिर के निर्माण के बाद कई राजाओं ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। सबसे पहले वारंगल के अर्जुन कुल के राजाओं ने करवाया उसके बाद वर्ष 1932-33 में महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी ने जीर्णोद्धार करवाया।
इस मंदिर से संबंधित कई सारी किवदंतियां प्रचलित है जिनके बारे में नीचे बताया गया है।ऐसा माना जाता है कि अन्नमदेव वारंगल से जब यहां आए तो उन्हें दंतेश्वरी माता का वरदान मिला था की जहां तक अन्नमदेव और उनके पीछे देवी आयेंगी जहाँ तक अन्नमदेव पैदल जायेंगे वहां तक उनका राज्य का विस्तार होगा लेकिन एक शर्त यह थी कि वो पीछे मुड़कर नहीं देख सकते हैं
अगर पीछे मुड़कर देखते हैं तो वहां पर देवी को स्थापित करना होगा।अन्नमदेव कई दिन और रात तक चलते रहे जब चलते-चलते डंकिनी शंखनी नदी के संगम पर पहुंचे तब नदी के जल में डूबे पैरों में पायल की आवाज़ पानी के कारण नहीं आ रही थी तो अन्नमदेव ने पीछे मुड़कर देखा।
जिसके बाद देवी ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। वचन के अनुसार माता के लिए अन्नमदेव ने डंकिनी शंखिनी के संगम के निकट एक मंदिर बनवा दिया तब से माता की मूर्ति वहीं विराजमान है।