
भोपाल : बिलखाती नदियों सी…निडर निर्झरों सा…मस्त झोंकों सा..उन्मुक्त लहरों सी….और बेलौस हंसी की तरह होता है अल्हड़ अलबेला बचपन। लेकिन अब इस बिंदास बचपन को किसी की नजर लग गई है, जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए जिनकी एक मुस्कान किसी रोते हुए इंसान को हंसा दे..ऐसे फूल से कोमल बच्चों पर वहशियाना जुल्म हो रहे हैं।
अपराधियों के शिकार बन रहे हैं नन्हें फरिश्ते और ये सब हो रहा है मध्यप्रदेश में। ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि सरकारी आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि उम्र के जिस पड़ाव में मासूमों को घर के आंगन में खेलना कूदना था। उस उम्र में ये बच्चे बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं, दूसरे प्रदेशों में जाकर भीख मांग रहे हैं। रईसों और रसूखदारों के घर पर चाकरी कर रहे हैं। वो भी तब, जब राज्य सरकार ये दावा करती है कि कहीं कुछ गड़बड़ नहीं है।
लेकिन जमीन हकीकत बिल्कुल उलट है। नाबालिग लड़कियों के लिए तो हालात और भी खराब हैं। आखिर इसकी वजह क्या है? आखिर वो कौन लोग हैं जो इसके पीछे जिम्मेदार हैं?