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    Home » सूचना के अधिकार के तहत भ्रमित जानकारी देने पर आईएफएस पर 25 हजार जुर्माना, सजा का भी है प्रावधान
    छत्तीसगढ

    सूचना के अधिकार के तहत भ्रमित जानकारी देने पर आईएफएस पर 25 हजार जुर्माना, सजा का भी है प्रावधान

    By Tv 36 HindustanOctober 26, 2021No Comments4 Mins Read
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    रायपुर । छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयुक्त ए.के.अग्रवाल ने आवेदक को भ्रमित करने और गलत जानकारी देने के कारण पंकज राजपूत आईएफएस वर्तमान में डीएफओ महासमुंद जो कि तत्कालीन जन सूचना अधिकारी, कार्यालय प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) छत्तीसगढ़ थे उन पर 25000 रुपये की पेनल्टी अधिरोपित कर प्रधान मुख्य वन संरक्षक को वसूली कर शासन के कोष में जमा कराने के आदेश जारी किए हैं। प्रदेश में यह पहला मामला है कि जब किसी आईएफएफ पर पेनल्टी लगाई है।

    आरटीआई में जानकारी ना देने पर सजा का भी प्रावधान:

    आरटीआई में सूचना नहीं देने वाले या जानबुझकर अधूरी मिथ्या भ्रमित करने वाली जानकारी देने वालों के विरूद्ध एफआईआर दर्ज करने का भी प्रावधान है।
    1.लोक सूचना अधिकारी द्वारा कोई जवाब नहीं देना धारा-7(2)
    आरटीआई एक्ट का उल्लंघन है। लोक सूचना अधिकारी द्वारा
    आरटीआई एक्ट की धारा-7(8) का उल्लंघन पर भारतीय दंड
    संहिता की धारा 166ए और 167 के तहत एफआईआर हो सकती है।
    2. लोक सूचना अधिकारी द्वारा झूठी जानकारी देना जिसका प्रमाण आवेदक के पास मौजूद है उस स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा 166 ए, 167, 420, 468 और 471 के तहत एफआईआर दर्ज हो सकती है।
    3. प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा निर्णय नहीं किये जाने की
    स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा 166ए, 188 के तहत एफ आई आर दर्ज कराई हो सकती है।
    4. प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष लोक सूचना अधिकारी
    द्वारा सुनवाई के बाद सम्यक सूचना के भी गैरहाजिर रहने की स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा 175, 176, 188, और 420 के तहत एफ आई आर दर्ज करवाई हो सकती है।
    5.प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा निर्णय करने के बाद भी
    सूचनाएं नहीं देने की स्थिति में भारतीय दंड संहिता की धारा
    188 और 420 के तहत एफआईआर दर्ज हो सकती है।
    6. लोक सूचना अधिकारी अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारी
    द्वारा आवेदक को धमकाने की स्थिति में आईपीसी की धारा 506 के तहत एफआईआर दर्ज करने का प्रावधान है।

    क्या था मामला:

    रायपुर के आवेदक नितिन सिंघवी ने अगस्त 2019 में प्रधान
    मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) के कार्यालय से छत्तीसगढ़ में
    असम से वन भैंसा लाने से संबंधित समस्त पत्रकारों की प्रतियां
    चाही थी। जिसके जवाब में जन सूचना अधिकारी ने बताया कि
    वन भैसा लाने से संबंधित कोई पत्राचार नहीं हुआ है।बाद में प्रथम अपील के दौरान बताया गया कि जानकारी इसलिए नहीं दी कि आवेदक ने यह नहीं बताया कि कौन से वन भैसे लाने का पत्राचार माँगा है। वन भैसा किसका है पालतू है या जंगली है, यह भी नहीं बताया है। आवेदक के पत्र से ऐसा लगता है कि वन भैंसा असम में कहीं रखा गया है, जिसे लाना है। कार्यालय की नस्ती में ऐसा कोई वन भैंसा से संबंधित पत्राचार नहीं हुआ है।

    जवाब ना मिलने पर आवेदक ने दिसंबर 2019 में एक नया आवेदन लगाकर के वन भैंसा लाने से संबंधित समस्त नस्तियों का अवलोकन कराने का आग्रह किया। जिसके जवाब में जन सूचना अधिकारी ने उचित जवाब नहीं दिया। इसके बाद आवेदक ने सूचना आयोग में शिकायत दर्ज करके बताया कि मई 2017 में छत्तीसगढ़ राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक में असम से 3 मादा वन भैसों को छत्तीसगढ़ लाने के निर्णय का जिक्र है, बैठक के मिनिट में यह भी उल्लेख है कि मुख्य वन्य प्राणी अभिरक्षक और वन मंत्री ने असम से पत्राचार किया है। शिकायत की सुनवाई के दौरान जुलाई 2021 में, वर्तमान जन सूचना अधिकारी ने असम से लाए जाने वाले वन भैसों से संबंधित 44 पत्रों को शिकायतकर्ता को उपलब्ध कराए और आयोग को बताया कि 44 पेज के दस्तावेज दिए गए है। बता दें कि ये वही आईएफएस अधिकारी हैं जिन पर राज्य सूचना आयोग मे एक मामले मे अपने सीनियर अधिकारी के नाम के आगे पत्राचार मे “श्री” नही लिखने पर कार्यवाही हेतु नोटिस दिया था।

    अब आयोग ने तत्कालीन जन सूचना अधिकारी पंकज राजपूत का जवाब संतोषजनक नहीं पाए जाने के कारण धारा 20(1) के तहत अधिकतम 25000 रुपये की पेनल्टी अधिरोपित की है।
    आखिर कब तक ऐसे पढ़े लिखे और जिम्मेदार अधिकारी आरटीआई कानून का माखौल उड़ाते रहेंगे? आखिर जिस जनता के टैक्स के पैसे से इन्हें वेतन मिलता है उस जनता के प्रति कब अपनी जवाबदेही समझेंगे?

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