नई दिल्ली:– आपको बता दे की प्रसव के लिए दो तरह की डिलीवरी ही सबसे ज्यादा प्रचलित हैं – इसमें एक सिजेरियन है और दूसरी वैजाइनल डिलीवरी है। आमतौर पर महिलाएं और डॉक्टर भी नॉर्मल यानी वैजाइनल डिलीवरी को ही सबसे बेहतर मानते हैं क्योंकि इसके बाद रिकवरी जल्दी हो जाती है। हालांकि, सिजेरियन डिलीवरी के बाद पूरी तरह से ठीक होने में महीने लग जाते हैं।
फिलहाल कुछ महिलाएं सिजेरियन डिलीवरी करवाती है क्योंकि उन्हें नॉर्मल डिलीवरी का दर्द नहीं सहना होता है। इस बीच हमेशा इस बात को लेकर बहस छिड़ी रहती है कि इन दोनों तरीकों में से क्या ज्यादा बेहतर है। पुणे के उमंग अस्पताल की गायनेकोलॉजिस्ट आशा गावड़े ने अपने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर कर के बताया है कि नॉर्मल डिलीवरी के बजाय सिजेरियन करवाने पर क्या फायदे मिलते हैं।
डॉक्टर आशा ने बताया कि सिजेरियन डिलीवरी में पेट को काटकर बच्चे को हल्के हाथ से बाहर निकल जाता है। इसमें बच्चे पर कोई भी दबाव या प्रेशर नहीं पड़ता है और वो बड़े आराम से बाहर आ जाता है। वहीं नॉर्मल डिलीवरी में बच्चा काफी देर तक प्रसव के रास्ते में रहता है जिससे उसे ऑक्सीजन कम मिलने का खतरा रहता है।
कई बार नॉर्मल डिलीवरी में बच्चे को बाहर खींचने के लिए कुछ उपकरण इस्तेमाल किए जाते हैं जैसे कि वैक्यूम या फोरसेप्स। इससे बच्चे को ट्रामा होने का खतरा रहता है। वहीं बच्चे पर सिजेरियन डिलीवरी में किसी भी तरह के उपकरण का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इससे बच्चे पर किसी भी प्रकार के ट्रामा का जोखिम कम हो जाता है
डॉक्टर ने कहा कि नॉर्मल डिलीवरी के दौरान कई बार बच्चे के बाहर निकलने के दौरान मलाशय या मूत्र मार्ग को चोट पहुंच जाती है। इससे महिलाओं को डिलीवरी के बाद पेशाब रोकने में दिक्कत होती है, योनि की मांसपेशियां फट या ढीली हो जाती हैं। इसकी वजह से आगे चलकर सेक्स में प्रॉब्लम और पेशाब न रोक पाने की समस्या हो सकती है। ये सभी परेशानियां सिजेरियन डिलीवरी में नहीं होती हैं।
tommys.org के अनुसार सिजेरियन डिलीवरी के दौरान दर्द कम होता है जबकि नॉर्मल डिलीवरी में कई घंटों तक दर्द सहना पड़ता है। कई महिलाएं लेबर पेन के डर से ही सिजेरियन डिलीवरी को खुद चुनती हैं। ये सिजेरियन डिलीवरी करवाने का सबसे अहम कारण है।
सिजेरियन डिलीवरी करवाने से योनि और मूत्राशय को चोट लगने का खतरा कम हो जाता है। इसके अलावा गर्भाशय, योनि, मूत्राशय या मलाशय के बाहर आने का जोखिम भी घट जाता है। इसे पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स कहते हैं। हालांकि, सिजेरियन के बाद रिकवर करने में काफी समय लग जाता है।
