देहरादून:- उत्तराखंड के जंगलों में औषधीय गुणों वाले पौधों पर पहली बार शोध होने जा रहा है. इसके लिए वन विभाग जंगलों में मौजूद जड़ी बूटियों से जुड़ी medicinal plant policy ला रहा है. खास बात यह है कि इस पॉलिसी के लिए ड्राफ्ट तैयार हो चुका है. जल्द ही पॉलिसी को हरी झंडी दी जाएगी. यह पॉलिसी उत्तराखंड में फॉरेस्ट क्षेत्र के लिए बन रही है, लेकिन इसका असर सभी हिमालयी राज्यों में मौजूद वनस्पतियों पर पड़ेगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि फॉरेस्ट मेडिसिनल प्लांट पॉलिसी के काम में दूसरे कई हिमालयी राज्य भी भागीदारी ले रहे हैं. इसके चलते पूरे हिमालयी क्षेत्र में मौजूद वनस्पतियों को ध्यान में रखकर यह पॉलिसी तैयार होगी.
CDH थ्योरी पर काम करेगी ये पॉलिसी: वन क्षेत्र में वनस्पतियों के लिए बन रही इस पॉलिसी को CDH थ्योरी पर तैयार किया जाएगा. C यानि कंजर्वेशन जिसके तहत ऐसी वनस्पतियों के संरक्षण के लिए कदम बढ़ाए जाएंगे, जो विलुप्त होने की स्थिति में है या फिर बेहद अहम होने के बावजूद जिसका संरक्षण नहीं हो पा रहा है. इसी तरह D यानी डेवलपमेंट जिसमें ऐसी वनस्पतियां आएंगी, जो वन क्षेत्र में मौजूद तो हैं, लेकिन उनको आगे विकसित नहीं किया जा रहा है. ऐसी वनस्पतियों को तकनीक के आधार पर और बेहतर मात्रा में उपलब्ध रखने पर जोर दिया जाएगा. इसके बाद अगली थ्योरी H होगी, जो वनस्पतियों के हार्वेस्टिंग से जुड़ी होगी. इसमें जंगलों में मौजूद वनस्पतियों के बेहतर उपयोग के लिए इसकी हार्वेस्टिंग की जाएगी, ताकि वन क्षेत्र में मौजूद इन वनस्पतियों का मेडिसिनल या दूसरे अहम उपयोग के रूप में प्रयोग किया जा सके.
वन क्षेत्र के लिए पहली बार उत्तराखंड मेडिसिनल प्लांट पॉलिसी ला रहा है, जोकि ना केवल इन वनस्पतियों के संरक्षण में अहम योगदान निभाएगी, बल्कि इसके उपयोग को और भी बेहतर करेगी. इसके लिए मेडिसिनल प्लांट पॉलिसी की रूपरेखा तैयार हो चुकी है और अब जल्द ही इस पर कदम आगे बढ़ाए जाएंगे. धनंजय मोहन- प्रमुख वन संरक्षक हॉफ
इस पहल से विभागीय अधिकारियों के साथ-साथ आयुर्वेद चिकित्सक खुश: वन विभाग की इस पहल से ना केवल विभागीय अधिकारी उत्सुक दिखाई दे रहे हैं, बल्कि आयुर्वेद से जुड़े चिकित्सक भी इसे महत्वपूर्ण मान रहे हैं. आयुर्वेद से जुड़े चिकित्सकों की मानें तो वन क्षेत्र में वनस्पतियों की भरमार है और अगर इनका संरक्षण और संवर्धन किया जाता है, तो आयुर्वेद के क्षेत्र में इसका बेहतर उपयोग किया जा सकता है.
वन विभाग की यह एक अच्छी पहल होगी और इससे आयुर्वेद के क्षेत्र में औषधिय रूप में इस पर बेहतर काम हो सकेगा. अरुण त्रिपाठी, कुलपति, आयुर्वेद विश्वविद्यालय
अनुसंधान के लिए अहम है प्राकृतिक मेडिसिनल प्लांट: वनस्पतियों पर शोध के लिए प्राकृतिक मेडिसिनल प्लांट्स सबसे अहम माने जाते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि जो वनस्पति प्राकृतिक रूप से जिस क्षेत्र में पैदा होती है, उसे वहां से लेकर उस पर शोध करना सबसे महत्वपूर्ण होता है. इससे ना केवल उस वनस्पति के परिवेश का पता चलता है, बल्कि उसके उपयोग और संरक्षण पर भी काम किया जा सकता है. वन विभाग जिस पॉलिसी को लाने जा रहा है, उसके लिए हिमाचल के एक्सपर्ट से लेकर कुछ दूसरे जानकारों की भी मदद ली जा रही है. इतना ही नहीं देश के बड़े अनुसंधान संस्थान भी पॉलिसी में जरूरी बिंदु को शामिल करने के लिए खुद इसका हिस्सा बन रहे हैं.
प्राकृतिक रूप से मौजूद वनस्पतियों को शोध के रूप में इस्तेमाल करने पर बेहतर परिणाम पाए जा सकते हैं. हिमालय मैं मौजूद वनस्पतियों पर अगर यह काम हो रहा है, तो इस पर बेहतर तरीके से शोध किया सकता है. डॉ. सुरेश चौबे, आयुर्वेद चिकित्सक
पॉलिसी में इन लोगों की भी होगी अहम भूमिका: भले ही वन क्षेत्र की वनस्पतियों के लिए पॉलिसी तैयार हो रही हो, लेकिन इसमें वन विभाग के अलावा स्थानीय परंपराओं से जुड़ी वनस्पतियों को जानने के लिए लोगों की जानकारी का लाभ भी लिया जाएगा. इसी तरह रिसर्च संस्थान से भी वन विभाग तालमेल बना रहा है. इतना ही नहीं जो लोग जड़ी बूटियों की खेती कर रहे हैं, उनसे भी बातचीत की जाएगी और जड़ी बूटियों के संवर्धन के लिए ऐसे लोगों को ट्रेनिंग देने का काम भी किया जाएगा. दूसरी तरफ विभिन्न वनस्पतियों से जुड़े प्रोडक्ट्स का बिजनेस कर रहे व्यापारियों के सुझावों को भी इसमें शामिल किया जाएगा.
आयुष पॉलिसी 2023 का भी होगा अध्ययन : वन क्षेत्र की वनस्पतियों को लेकर मेडिसिनल प्लांट पॉलिसी बनाने के दौरान आयुष पॉलिसी 2023 का भी अध्ययन किया जाएगा. इसके ड्राफ्ट डॉक्यूमेंट को तैयार करते हुए बायोडायवर्सिटी और राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों से भी इस पर चर्चा की जाएगी.
पॉलिसी के तहत काम करने के लिए तैयार होगा फाइनेंशियल मेकैनिज्म: पॉलिसी पर काम करने के लिए फाइनेंशियल मेकैनिज्म को भी तैयार किया जाएगा. इसके लिए काम बिना वित्तीय अड़चन के हो इस पर भी पॉलिसी में ही चर्चा की जाएगी. जिसमें राज्य या केंद्रीय स्तर पर फंडिंग की व्यवस्था करने और अंतरराष्ट्रीय ग्रांट और फंडिंग एजेंसी का सहयोग लेने पर भी विचार किया जाएगा. इस दौरान तमाम प्रैक्टिस को सब्सिडीज करने का भी प्रयास होगा.
जर्मप्लाज्म बैंक स्थापित किए जाएंगे: संरक्षण रणनीति के तहत जैव विविधता संपन्न क्षेत्र में औषधिय पौधों के संरक्षण क्षेत्र की पहचान और उसकी स्थापना की जाएगी. औषधिय पौधों को संरक्षित करने के उद्देश्य से लगातार सर्वेक्षण और मानचित्र का संचालन किया जाएगा. इस दौरान विभिन्न प्रजातियों के अति दोहन को रोकते हुए टिकाऊ कटाई रणनीति लागू की जाएगी. उच्च गुणवत्ता वाले रोपण सामग्री को उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बीज और जर्मप्लाज्म बैंक स्थापित किए जाएंगे. वहीं, प्रोत्साहन और सब्सिडी के माध्यम से किसानों को बंजर और सीमांत भूमि पर औषधिय पौधों की खेती के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा.
