नई दिल्ली:- कृष्ण का मतलब है जो चराचर जगत के सभी प्राणियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इसलिए सृष्टि का कण-कण कृष्ण की ओर आकर्षित होता है। दरअसल, कृष्ण अकेले हैं जो सोलह कलाओं से परिपूर्ण परमपुरुष हैं, इसलिए सृष्टि के समस्त रूप-रंग और आकार-प्रकार कृष्ण में समाए हुए हैं। भगवान राम को शील, सौंदर्य और शक्ति से परिपूर्ण त्रिवेणी संगम कहा गया है। निस्संदेह मर्यादा पुरुषोत्तम राम में ये तीनों गुण समाहित हैं। उल्लेखनीय है कि राम का शील, सौंदर्य और शक्ति का अद्भुत समन्वय पहले से ही कृष्ण में मौजूद है, लेकिन राम में प्रेम और उत्सवधर्मिता के जो तत्व नदारद हैं, वे भी श्रीकृष्ण में साकार हो जाते हैं। सनातन संस्कृति की अवतारी परपंरा में कृष्ण अकेले हैं जो दुखों के महासागर में हंसते-गाते-नाचते द्वीप की तरह हैं। उत्सवधर्मिता भारत की सनातन परंपरा है, उत्सव भारतीय जनमानस की जीवन-शैली का अहम हिस्सा है। और कृष्ण की समस्त लीलाएं यानी जन्म से लेकर देह-विसर्जन तक प्रेम और उत्सव पर आधारित हैं।
श्रीकृष्ण की लीलाओं का प्रत्येक आयाम सहज और सरल मालूम होता है, पर बाल्यावस्था से लेकर अर्जुन को अपने विराट रूप के दर्शन कराने तक उनकी समस्त लीलाएं हमारा मार्गदर्शन करती हुई विषमताओं से सामंजस्य स्थापित करना सिखाती हैं। छांदोग्य उपनिषद, महाभारत महाकाव्य और भागवत पुराण के अनुसार उनकी जीवन-यात्रा को बाल्यकाल, युवावस्था का मैत्रीभाव, गृहस्थ जीवन, गीता का उपदेशक और संन्यासी के रूप में बांट कर सुगमता से समझा जा सकता है। एक अबोध बालक बचपन के आरंभिक दौर में धूल-मिट्टी में खेलता हुआ,अपनी अदाओं से केवल निश्छल प्रेम ही फैलाता है। माखनचोर के लीलावतार में श्रीकृष्ण ने बालसुलभ-प्रेम का ही विस्तार किया है। जब तक बालक के मानसिक विकास की प्रक्रिया प्रारंभ नहीं होती तब तक वह हर चतुराई से दूर रहता है। लेकिन मानसिक विकास की शुरुआत होते ही उसके मन में उथल-पुथल का दौर आरंभ हो जाता है। इस स्थिति में बालक को विचारों व भावनाओं को नियंत्रित करने की जरूरत होती है। क्या उचित है, क्या अनुचित है, दोनों के अंतर को समझने के लिए अपने विवेक को जागृत करना पड़ता है।
कृष्ण द्वारा कंस का वध अहंकार पर विजय प्राप्ति का प्रतीक है। जब व्यक्ति हर तरह के अहं का विसर्जन कर देता है तो उसके हृदय में विनयशीलता और दयालुता स्थापित हो जाती हैं। इन दोनों सद्गुणों को धारण करने पर व्यक्ति गृहस्थ बनने के योग्य हो जाता है। कृष्ण को प्राय: मुरलीधर के रूप में दिखाया जाता है। मुरली को हर वक्त श्रीकृष्ण अपने संग रखते हैं। मुरली आंतरिक रूप से खाली है और उसमें आठ छिद्र भी हैं। यह इस बात का परिचायक है कि जब हमारा अन्तःकरण निर्मल और पारदर्शी हो जाता है तो ईश्वरीय कृपा की अनुभूति होने लगती है। गीताकार के रूप में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा, ‘ज्ञानी पुरुष कर्मफल की इच्छा का परित्याग करते हुए कर्म करता है और समस्त प्रकार के बंधनों से मुक्त होकर आध्यात्मिक आनंद को प्राप्त करता है।’
