सरगुजा :- अम्बिकापुर में मां महामाया का मंदिर है, सम्पूर्ण सरगुजा के लोगों की आराध्य देवी मां महामाया हर किसी के आस्था का केंद्र हैं. लेकिन बहुत कम लोगों को ही इस बात का पता है कि इस मंदिर में एक नहीं दो अलग-अलग देवियों की प्रतिमाएं हैं.जिस देवी को लोग मां महामाया समझकर पूजते हैं,दरअसल वो महामाया मां नहीं हैं.आईए जानते हैं आखिर मंदिर में स्थापित दूसरी देवी कौन हैं.
महामाया मंदिर में दो प्रतिमाएं हैं स्थापित : चैत्र नवरात्रि में माता के मंदिरों में भारी भीड़ देखी जाती है.छत्तीसगढ़ में कई दैवीय स्थल हैं.जो अपने नाम से ही जाने जाते हैं.ऐसा ही प्रसिद्ध देवी स्थल मां महामाया मंदिर भी है.जो अंबिकापुर में है. मां महामाया के मंदिर में देवी दो प्रतिमाएं स्थापित हैं. लेकिन ये दोनों प्रतिमाएं अलग-अलग देवियों की है.नवरात्रि में दोनों ही प्रतिमाओं के दर्शन भक्त करते हैं.आज हम आपको बताएंगे कि दूसरी प्रतिमा किस देवी है.
क्यों स्थापित की गई दूसरी प्रतिमा : महामाया मंदिर में स्थापित दूसरी प्रतिमा का संबंध उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर जिले के विंध्यांचल पर्वत पर विराजी मां विंध्यवासिनी से है. यहां महामाया के साथ विंध्यवासिनी की प्रतिमा विराजमान है. क्योंकि महामया मंदिर में शुरू से ही दो प्रतिमा ही थी, बड़ी प्रतिमा को बड़ी समलाई और छोटी प्रतिमा को छोटी समलाई कहा जाता था. कालान्तर में एक प्रतिमा को शहर के नजदीक स्थापित किया गया और उसे समलाया माता के रूप में पूजा जाने लगा और वर्तमान महामाया में अकेली प्रतिमा बड़ी समलाई महामया के रूप में पूजी जाने लगीं.
सरगुजा राजघराने की कुलदेवी हैं मां महामाया : महामाया सरगुजा राजपरिवार की कुल देवी हैं.यहां राजपरिवार के लोग ही विशष पूजा करते हैं. वर्तमान में राजपरिवार के अनुसार पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव महाराज सरगुजा के दायित्व को निभाते हुए मंदिर में विशेष पूजा करते हैं. सरगुजा के इतिहासकार गोविंद शर्मा बताते हैं कि महामाया मंदिर का जीर्णोद्धार करीब 1910 में कराया गया था, जब महाराज चंडीकेश्वर शरण सिंहदेव का मुंडन 1910 में हुआ. उसी के बाद मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया गया था. तभी यहां महामाया के साथ विंध्यवासिनी माता की मूर्ति विंध्याचल से लाकर स्थापित की है.
सरगुजा के महाराज रघुनाथ शरण सिंहदेव की पत्नी भगवती देवी मिर्जापुर के पास विजयगढ़ रियासत की राजकुमारी थीं, विंध्यवासिनी उनकी कुल देवी थीं. उन्होंने ने ही यहां विंध्यवासिनी माता की स्थापना कराई थी. इससे पहले यहां दो प्रतिमा थी एक बड़ी समलाई दूसरी छोटी समलाई छोटी समलाई को रसूलपुर के पास स्थापित किया गया. यहां बड़ी समलाई या महामाया के साथ विंध्यवासिनी माता स्थापित की गईं. जो लाल रंग की मूर्ति है वो महामाया है और काले रंग की मूर्ति विंध्यवासिनी की है. आपके दाएं तरफ लाल रंग में मां महामाया और बाएं तरफ काली रंग की मां विंध्यवासिनी हैं- गोविंद शर्मा,इतिहासकार
सप्तमी में कुछ देर के लिए दर्शन होते हैं बंद : हर बार नवरात्रि में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ महामाया मंदिर में उमड़ती है. हजारों की संख्या में अखण्ड ज्योति जलाई जाती है. इस मंदिर में भीड़ कितनी भी हो आपको लाइन से ही दर्शन करना होता है. वीआईपी दर्शन की कोई अतिरिक्त व्यवस्था यहां नही की जाती है. आम हो या खास सभी एक साथ दर्शन करते हैं. लेकिन नवरात्रि की सप्तमी को संधि काल मुहूर्त में जब राजपरिवार के लोग संधि पूजा करने पहुंचते हैं तो कुछ देर के लिए दर्शन बन्द कर दिया जाता है.