नई दिल्ली:– जब भी छत्तीसगढ़ में जन समुदाय की बात होती है तब लोगों को आदिवासी समुदाय का ख्याल जरूर आता है. छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदाय का जल, जंगल, जमीन की तरह वाद्ययंत्रों से भी गहरा रिश्ता रहा है. मनोरंजन, उत्सव व सुरक्षा के लिए यह समाज कई तरह के वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल करता आ रहा है. इस समाज में वाद्ययंत्रों की पूजा भी होती है. लेकिन समय के साथ-साथ आदिवासी समाज में प्रचलित कई वाद्ययंत्र तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं. आज विश्व आदिवासी दिवस पर हम आपको आदिवासी समुदाय के प्रमुख वाद्य यंत्रों से परिचय कराने वाले हैं.
इन वाद्य यंत्रों को संरक्षित कर रखा गया है
राजधानी रायपुर के कलेक्ट्रेट चौक के पास महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय है. यहां छत्तीसगढ़ के धरोहर को सहेजने का काम किया जा रहा है. आदिवासियों से जुड़े वाद्य यंत्र यहां संरक्षित कर रखा गया है. आदिवासी समुदाय मुख्य रूप से जिन वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल करते थे वह आपको बताने वाले हैं. सुरही, तीनतारी, सिंग की तुरही, भन्नाटी वांसु, खड़ताल, महुवेर, तीन तारी, नंकदेवन, चिकारा, तीनतारी, घुमरा, मुंडा बाजा, दमऊ, खंजेली, डफ, टिमकी, कोंडोडका, मंदारी, मांदर, टमरिया, सिंग बाजा, गुदुम, तंबूरा, नंगाडा, जैसे कई आदिवासियों के वाद्य यंत्रों को संरक्षित कर रखा गया है.
ऐसे करते थे इस्तेमाल
बस्तर, सरगुजा समेत छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों में आज भी इन वाद्य यंत्रों का मनोरंजन, उत्सव व सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाता है. आदिवासी लोग प्रकृति से गहरा संबंध होने के कारण प्रकृति से उत्पन्न ध्वनि जैसे पशु पक्षी, आंधी तुफान, बारिश, वायु इत्यादि का आसनी से नकल कर सकते थे जिसे उस आवाज या ध्वनि को वाद्य यंत्र द्वारा परिवर्तित कर जंगली जानवर को भागते हैं, एवं उसके जरिए शिकार भी करते हैं और अपने भोजन प्रबंध करते हैं. इस तरह वाद्य यंत्र को समाजिक कार्यों, आर्थिक कार्यों एवं धार्मिक कार्यों में भी इस्तेमाल करते हैं जैसे कि लोकनृत्य, लोकगाथा, लोकगीत जैसे विभिन्न कार्यों में विभिन्न वाद्ययंत्रों को इस्तेमाल किया जाता है.
