नई दिल्ली :- इस चुनावी महासमर में ‘एम’ फैक्टर केंद्र में आ गया है। एम यानी मोदी, मुस्लिम, मंगलसूत्र, यहां तक कि मटन और मछली भी चुनावी शब्दावली का हिस्सा बन गए हैं। वहीं विपक्ष अपनी दुर्दशा के लिए मीडिया, मार्केटिंग और मनी को दोषी ठहरा सकता है। लेकिन जो ‘एम’ इस बार निर्णायक साबित हो सकता है, वह है- महिला।
भारतीय चुनावी इतिहास में इससे पहले कभी भी महिला वोट का इतना महत्व नहीं रहा था। यह ‘पॉवर ऑफ 49’ वोट बैंक ही है, जो ‘लहर-रहित’ चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को बड़ा फायदा पहुंचा सकता है, क्योंकि महिलाओं का झुकाव अभी भी सत्ताधारी दल के पक्ष में अधिक है।
आइए, थोड़ा गणित करते हैं। 2019 के चुनावों में पहली बार ऐसा हुआ था, जब महिलाओं का मतदान-प्रतिशत पुरुषों की तुलना में अधिक था, चाहे थोड़ा-सा ही : 67.02 प्रतिशत की तुलना में 67.18 प्रतिशत। लेकिन मौजूदा चुनाव में, पंजीकृत महिला मतदाताओं में 7.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो पुरुषों से अधिक है।
अब लगभग 47.1 करोड़ महिलाएं पंजीकृत मतदाता हैं और 12 राज्यों में लैंगिक-अनुपात 2019 के 8 राज्यों की तुलना में महिलाओं के पक्ष में हो गया है। 2019 में एक्सिस माय इंडिया पोल सर्वेक्षण से पता चला था कि 44 प्रतिशत पुरुषों की तुलना में 46 प्रतिशत महिलाओं ने भाजपा को वोट दिया था। वहीं लोकनीति-सीएसडीएस के 2019 के अध्ययन से पता चला था कि 59 प्रतिशत महिलाएं अब परिवार में पुरुष सदस्यों से स्वतंत्र होकर अपने मतदान-निर्णय स्वयं ले रही हैं।
महिला मतदाताओं का उभार सिर्फ 2014 के बाद की परिघटना नहीं है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में जयललिता महिलाओं को कई प्रकार की छूट और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्रदान करती थीं, जिससे वे बड़ी आसानी से सत्ता विरोधी लहर से निपटने में सक्षम हो जाती थीं।
बिहार में नीतीश कुमार अति पिछड़ा जातियों के साथ ही महिलाओं के बीच अपना अलग वोट बैंक बनाकर लालू यादव के जातिगत गणित को तोड़ने में सक्षम हुए थे। 2006 में बिहार देश का पहला राज्य बन गया, जहां स्थानीय निकायों और पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया।
बंगाल में अगर ममता बनर्जी 2021 में भाजपा को दूर रखने में सफल हुईं, तो यह काफी हद तक कन्याश्री जैसी उनकी सफल महिला-केंद्रित योजनाओं का ही परिणाम था। भाजपा भी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लाडली बहना और महतारी वंदना योजनाओं की मदद से जीती।
इन दोनों योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं को सीधे नकद लाभ सुनिश्चित करना था। और अगर कांग्रेस ने पिछले साल कर्नाटक में जीत हासिल की, तो इसके लिए जिम्मेदार उसकी ‘गारंटियों’ में गृह-लक्ष्मी योजना भी शामिल थी, जो परिवार की महिला मुखियाओं को प्रतिमाह 2000 रु. प्रदान करती है। वहीं शक्ति योजना के तहत राज्य द्वारा संचालित बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा प्रदान की जाती है।
नरेंद्र मोदी ने भी महिला मतदाताओं का समर्थन जीतने की भरसक कोशिशें की हैं। चाहे वह उज्ज्वला योजना हो, जन-धन योजना हो, आवास योजना या हाल की लखपति दीदी योजना- ये सभी महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण के लिए बनाई गई हैं।
हालांकि ये सभी परियोजनाएं समान रूप से सफल नहीं रही हैं। उज्ज्वला योजना का उद्देश्य ग्रामीण और गरीब परिवारों को एलपीजी गैस सिलेंडर उपलब्ध कराना था, लेकिन उसमें रिफिल-दर खराब देखी गई है।पिछले साल सूचना का अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में पाया गया कि हर चार लाभार्थियों में से एक ने वित्त वर्ष 2022-23 में कोई सिलेंडर नहीं लिया या सिर्फ एक रिफिल लिया, जिसका मुख्य कारण सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी था। इरादा स्पष्ट है : महिलाओं को खुद को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की प्रमुख ‘लाभार्थी’ के रूप में देखना चाहिए।
ऐसे में सवाल उठाता है कि यह महिला मतदाता वास्तव में कौन हैं और क्या चीज उन्हें किसी पार्टी या नेता को वोट देने के लिए प्रेरित करती है? भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में कोई भी सामान्यीकरण जोखिम से भरा होता है, फिर भी एक निश्चित पैटर्न उभर रहा है, जिसमें मुख्यत: कम आय वर्ग वाली महिला मतदाता दोहरी चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करती हैं : आजीविका और सुरक्षा। जबकि उनसे अधिक महत्वाकांक्षी महिलाएं कार्यस्थल और उससे परे समान अवसरों के लिए पहचान की लड़ाई लड़ रही हैं।
महंगाई से त्रस्त गृहणियों के लिए प्रतिमाह पांच किलो मुफ्त खाद्यान्न एक बड़ी राहत है।
