नई दिल्ली:- सनातन धर्म अपनी अनूठी संस्कृति और उत्सव-त्योहारों के लिए चर्चित है. हर महीने कोई न कोई पर्व आता रहता है, जिससे मानव का जीवन प्रफुल्लित रहता है. क्या आप जानते हैं कि सनातन संस्कृति में 4 ऐसी रातें आती हैं, जो बेहद पवित्र मानी जाती हैं. इन रातों को लाखों लोग जागकर आराध्य देवों की वंदना करते हैं. इन 4 रात्रियों का वर्णन शास्त्रों में भी किया गया है. इनमें से महाशिवरात्रि और नवरात्रि के बारे में तो सब लोग जानते होंगे लेकिन बाकी 2 रात्रि कौन सी हैं और उनका क्या महत्व है, इसके बारे में आज हम आपको विस्तार से बताएंगे.
महाशिवरात्रि
यह रात्रि महादेव की आराधाना से संबंधित है. इसका निर्माण 2 रात्रियों को मिलाकर होता है. इसमें एक नवरात्रि में जगदंबा की पूजा की जाती है. इस रात्रि को महारात्रि के नाम से पुकारा जाता है. जबकि दूसरी राज्ञि में गौरी-शंकर का विवाह संपन्न हुआ था, इसलिए उसे महाशिवरात्रि कहा जाता है.
नवरात्रि
यह रात्रि 9 दिनों तक चलती हैं. इसका संबंध मां दुर्गा की आराधना से है. इन 9 दिनों में व्रत रखकर मां दुर्गा की स्तुति की जाती है, जबकि रात्रि में समय निकालकर उनका वंदन किया जाता है. इन 9 दिनों के दौरान पूरे घर में सात्विक ऊर्जा का अहसास होता है. किसी भी नए कार्य की शुरुआत के लिए इन 9 दिनों को बहुत शुभ माना जाता है.
दारुण रात्रि
इस रात्रि का संबंध भगवान विष्णु से है, जब भक्त प्रह्लाद के लिए उन्हें नरसिंह अवतार लेकर पृथ्वी पर आना पड़ा. हिरणकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद की नारायण भक्ति से बहुत परेशान रहता था. कई बार समझाने के बावजूद जब वह नहीं माना तो उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए. होलिका को वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी. लेकिन श्री हरि को तो कुछ और ही मंजूर था. उस होली में होलिका का दहन हो गया और भक्त प्रह्लाद को खरोंच तक नहीं आई. इसे ही दारूण रात्रि कहा जाता है.
काल रात्रि
शास्त्रों के अनुसार, इस रात्रि का संबंध मां काली से माना जाता है. यह दिवाली के दिन आती है. कहते हैं कि इस दिन मां काली का उद्भव हुआ था. इसी दिन भगवान श्री राम रावण का वध करके मां सीता और छोटे भाई लक्षमण के साथ अयोध्या लौटे थे. उनके आगमन की खुशी में लोगों ने अमावस्या की उस रात को आतिशबाजी करके और मिठाइयां बांटकर अपनी खुशियों का इजहार किया था.