सुनवाई के दौरान अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने तो ये तक कह दिया कि इन टेक कंपनियों के हाथ खून से रंगे हैं. एक ऐसी चीज बना दी है जिनसे लोग मर रहे हैं. अमेरिका में तो मेटा के सीईओ ने माफी मांग ली है, लेकिन ये मुद्दा सिर्फ अमेरिका की होती तो शायद कोई बात न थी, बल्कि बहुत से ऐसे देश हैं, खासकर भारत भी, जहां बच्चे ऑनलाइन शोषण का शिकार हो रहे हैं. आज की बात फेसबुक के हवाले से. क्योंकि फेसबुक की यात्रा के बीस साल पूरे हो गए हैं.
फेसबुक जब मार्केट में लॉन्च हुआ, तो लॉन्चिंग के सालभर के भीतर ही इसने 10 लाख लोगों को अपने प्लेटफॉर्म से जोड़ लिया. वजह रही इसकी कई खूबियां. उनमें से एक था फोटो में लोगों को ‘टैग’ करने का ऑप्शन देना. तब ये पहला प्लेटफॉर्म था, जो लोगों को पर्सनलाइज्ड एक्सपीरियंस दे रहा था.आपसे जुड़ी हर जानकारी, चाहें आपका बर्थडे हो या और कोई खास दिन या फिर आपके दोस्तों से जुड़ी बातें, ये आपको बताता था. हालांकि इस वजह से बाद में फेसबुक पर यूजर्स की प्राइवेसी के उल्लंघन के भी आरोप लगे मगर कंपनी आगे बढ़ती रही.यूजर्स बेतहाशा बढ़ें और अब इनकी संख्या दुनियाभर में 3 अरब के करीब है.
इसी साल जुकरबर्ग ने फेसबुक का नाम बदलकर मेटा कर दिया. मेटावर्स से मतलब ये था कि डिजिटल दुनिया में वर्चुअल स्पेस की ओर अब गाड़ी आगे बढ़ेगी.जुकरबर्ग का कहना था कि कंपनी का नाम बदल ने नए लोगों को साथ लाएंगे लेकिन ये बात हर कोई करेगा कि आज की नौजवान पीढ़ी के बीच फेसबुक पहले की तरह लोकप्रिय नहीं है. हां, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ये यूजर्स की संख्या के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अब भी है.
फेसबुक के विवादों की लिस्टफेसबुक का इन दो दशकों मे विवादों से भी खूब नाता रहा. लोगों की प्राइवेसी की अनदेखी से लेकर नफरती भाषणों और बयानों को बढ़ावा देने और फेक न्यूज पर एक्शन न लेने तक के कई गंभीर आरोप इस पर लगे.
फेसबुक के दावे क्या हैं और सच्चाई क्या, आइये इस पर एक नजर डालते हैं.1. जुकरबर्ग दावा करते हैं कि फेसबुक के ज़रिए वो दुनिया को एक बेहतर जगह बना रहे हैं. लेकिन ये हकीकत के नजदीक बात नहीं लगती. 2007 में फेसबुक ने Beacon सिस्टम लांच किया. इसकी मदद से एडवरटाइजर्स को यानी जो विज्ञापन देने वाले लोग हैं, उनको फेसबुक लोगों के डाटा देने लगा ताकि यूजर्स को उनकी जरूरत के हिसाब से विज्ञापन दिखाए जाएं.
इस फीचर के जरिए कोई भी वेबसाइट और ऐप फेसबुक से विज्ञापन के लिए डाटा ले सकते थे. फेसबुक का मुख्य कारोबार विज्ञापन से ही आता है.ये आपको टार्गेटिंग विज्ञापन की सुविधा देता है जहां आप कंपनी तय करती है कि उसका ये कस्टमर है और फिर उसके सामने विज्ञापन परोस दिया जाता है. 2023 में कंपनी ने सिर्फ विज्ञापनों के जरिए भारत में 18, 308 करोड़ रूपए कमाए. फेसबुक ये तय करता है कि कोई खास कंपनी का विज्ञापन उन्हीं तक पहुंचे जिन तक विज्ञापन देने वाला अपनी बात पहुंचाना चाहता है.
उदाहरण के लिए, जैसे आपने एक बार किसी ब्रांड का कपड़ा पसंद कर लिया, तो फेसबुक आपको किसी दूसरे ब्रांड के कपड़े नहीं दिखाएगा. आपको हर जगह वही ब्रांड दिखेगा जो जिस पर आपने शुरुआत में दिलचस्पी दिखाई थी.2. थोड़ी पुरानी बात है, अमेरिका के पॉलिटिकल कंसल्टिंग फर्म कैम्ब्रिज एनालिटिका पर दुनियाभर के यूजर्स के डेटा चोरी के आरोप लगे. पता चला पांच करोड़ फेसबुक यूजर के डेटा भी बिना किसी की सहमति के इस कंपनी को दे दिए गए.
आरोप था कि उस डेटा का इस्तेमाल 2016 में हुए अमरीकी चुनावों को प्रभावित करने के लिए किया गया. इस खुलासे के बाद भारत में भी बवाल मचा. आरोप की वजह से एक दिन के अंदर फेसबुक को करोड़ो का नुकसान हुआ. बाद में इस मामले को रफा दफा करने के लिए मेटा को 725 मिलियन डॉलर यानी करीब 6,000 करोड़ रुपये चुकाने पड़े.
वो 2021 में व्हिसलब्लोअर बनकर सामने आईं. इस व्हिसलल ब्लोअर का दावा था कि प्लेटफॉर्म के जरिये सामाजिक बंटवारे को बढ़ावा मिलता है, बच्चों पर बुरा असर पड़ता है और बतौर कंपनी फेसबुक इसकी अनदेखी करती है. पिछले साल 2023 के अक्टूबर में ही कम से कम 33 अमेरिकी राज्यों ने मेटा के खिलाफ कोर्ट केस किया. मेटा पर आरोप था कि उसने जानबूझकर अपने प्लेटफॉर्म को बच्चों के लिए एडिक्टिव बनाया. बताया गया कि कंपनी को लाखों शिकायतें मिली. इसके बावजूद कंपनी ने सिर्फ कुछ ही अकाउंट को डिसएबल किया.भारत, फेसबुक और जरूरतये तो अमेरिका की बात हुई लेकिन भारत को फेसबुक से कुछ और सेफ्टी और प्राइवेसी फीचर्स की मांग करनी चाहिए.
